ग़ुबार रंज का, पर्दों में बयाँ करते हैं,
यूँ गुनहगार सर-ए-आम ख़ता करते हैं,,
छप के बिकते थे जो अख़बार, रिसाले,
सुना है इन दिनों वो बिक के छपा करते हैं..
इस एहतिमाम-ऐ-जश्न-ऐ-मशिय्यत को क्या कहूँ,
,पैदा किया है दर्द,, दिल-ए-आदमी के साथ..
वो कहते हैं लिखो मगर कुछ अदब से,
' बहुत बेअदब हूं ' ये लिख दिया अदब से.
.हर तमन्ना जब दिल से रुख़्सत हो गई..
यक़ीन मानिये फ़ुर्सत ही फ़ुर्सत हो गई..
दिलकश नग़मे, दिलफ़रेब मौसम और चंद पुराने दोस्त,
यक़ीं करने को काफी है ज़िन्दगी ख़ूबसूरत है...
रात दिन मुस्तक़ील कोशिशें कि ज़िन्दगी कैसे बेहतर बने..
इतने दुख इस ज़िन्दगी के लिये और उसी का भरोसा नही..
मैं ही झुकता हूँ हमेशा.. आसमाँ बन के ...
जानता हूँ, ज़मीं को उठने की आदत नही.
दुआ देते हुए तुमको ग़ुज़र जाएंगे दुनिया से,
मिज़ाजों के क़लन्दर हैं हमें दुनिया से क्या लेना...
- वाली आसी -
इबादत वो है,
जिसमें ज़रूरतों का
ज़िक्र ना हो...
सिर्फ उसकी रहमतों
का शुक्र हो..
जब किसी से कोई गिला रखना
सामने अपने आईना रखना
यूँ उजालों से वास्ता रखना
शम्मा के पास ही हवा रखना
एक हुनर है चुप रहने का
इक ऐब है कह देने का....
सिर्फ़ लिबास ही महंगा हुआ है ज़नाब
आदमी आज़ भी दो कौड़ी का है....
वो रफुगर भी कहाँ तक करे मेहनत मुझ पर..
ज़ख़्म इक सिलता नहीं दूसरा लग जाता हैं..
मकड़ी भी नहीं फँसती अपने बनाए जालों में
जितना आदमी उलझा है अपने ही खयालो में...
शीशे की ....तरह
आर- पार हुं
फिर भी बहुतों की
समझ से बाहर हूं ...
.
कभी किसी को
जीते जी कन्धा दे दीजिये...
ज़रुरी नही ये रस्म
मौत के बाद निभाई जाये..
शौक़ सारे छिन गये, दीवानगी जाती रही,
आयीं ज़िम्मेदारियाँ तो आशिकी जाती रही,
मांगते थे ये दुआ हासिल हो हमको दौलतें,
और जब आयी अमीरी शायरी जाती रही,
रौशनी थी जब मुकम्मल बंद थीं ऑंखें मेरी,
खुल गयी आँखें मगर फिर रौशनी जाती रही,
इस कदर मुझमे अनासिर आप के होने लगे,
मुझ में जो कुछ भी थी मेरी बानगी जाती रही,
ये मुनाफ़ा, ये ख़सारा, ये मिला, वो खो गया
फेर में निनयानबे के ज़िन्दगी जाती रही,
दस से ले कर पांच तक सिमटी हमारी ज़िन्दगी,
दफ़्तरी आती रही, आवारगी जाती रही,
मुस्कुरा कर वो सितमगर फिर से हमको छल गया,
भर गया हर ज़ख्म सब नाराज़गी जाती रही
'उम्र बढ़ती जा रही है तुम बड़े होते नहीं,'
ऐसे तानों से हमारी मसख़री जाती रही,
वो आराम से हैं
जो पत्थर के हैं..
मुसीबत तो
एहसास वालों की है..
यूँ गुनहगार सर-ए-आम ख़ता करते हैं,,
छप के बिकते थे जो अख़बार, रिसाले,
सुना है इन दिनों वो बिक के छपा करते हैं..
इस एहतिमाम-ऐ-जश्न-ऐ-मशिय्यत को क्या कहूँ,
,पैदा किया है दर्द,, दिल-ए-आदमी के साथ..
वो कहते हैं लिखो मगर कुछ अदब से,
' बहुत बेअदब हूं ' ये लिख दिया अदब से.
.हर तमन्ना जब दिल से रुख़्सत हो गई..
यक़ीन मानिये फ़ुर्सत ही फ़ुर्सत हो गई..
दिलकश नग़मे, दिलफ़रेब मौसम और चंद पुराने दोस्त,
यक़ीं करने को काफी है ज़िन्दगी ख़ूबसूरत है...
रात दिन मुस्तक़ील कोशिशें कि ज़िन्दगी कैसे बेहतर बने..
इतने दुख इस ज़िन्दगी के लिये और उसी का भरोसा नही..
मैं ही झुकता हूँ हमेशा.. आसमाँ बन के ...
जानता हूँ, ज़मीं को उठने की आदत नही.
दुआ देते हुए तुमको ग़ुज़र जाएंगे दुनिया से,
मिज़ाजों के क़लन्दर हैं हमें दुनिया से क्या लेना...
- वाली आसी -
इबादत वो है,
जिसमें ज़रूरतों का
ज़िक्र ना हो...
सिर्फ उसकी रहमतों
का शुक्र हो..
जब किसी से कोई गिला रखना
सामने अपने आईना रखना
यूँ उजालों से वास्ता रखना
शम्मा के पास ही हवा रखना
एक हुनर है चुप रहने का
इक ऐब है कह देने का....
सिर्फ़ लिबास ही महंगा हुआ है ज़नाब
आदमी आज़ भी दो कौड़ी का है....
वो रफुगर भी कहाँ तक करे मेहनत मुझ पर..
ज़ख़्म इक सिलता नहीं दूसरा लग जाता हैं..
मकड़ी भी नहीं फँसती अपने बनाए जालों में
जितना आदमी उलझा है अपने ही खयालो में...
शीशे की ....तरह
आर- पार हुं
फिर भी बहुतों की
समझ से बाहर हूं ...
.
कभी किसी को
जीते जी कन्धा दे दीजिये...
ज़रुरी नही ये रस्म
मौत के बाद निभाई जाये..
शौक़ सारे छिन गये, दीवानगी जाती रही,
आयीं ज़िम्मेदारियाँ तो आशिकी जाती रही,
मांगते थे ये दुआ हासिल हो हमको दौलतें,
और जब आयी अमीरी शायरी जाती रही,
रौशनी थी जब मुकम्मल बंद थीं ऑंखें मेरी,
खुल गयी आँखें मगर फिर रौशनी जाती रही,
इस कदर मुझमे अनासिर आप के होने लगे,
मुझ में जो कुछ भी थी मेरी बानगी जाती रही,
ये मुनाफ़ा, ये ख़सारा, ये मिला, वो खो गया
फेर में निनयानबे के ज़िन्दगी जाती रही,
दस से ले कर पांच तक सिमटी हमारी ज़िन्दगी,
दफ़्तरी आती रही, आवारगी जाती रही,
मुस्कुरा कर वो सितमगर फिर से हमको छल गया,
भर गया हर ज़ख्म सब नाराज़गी जाती रही
'उम्र बढ़ती जा रही है तुम बड़े होते नहीं,'
ऐसे तानों से हमारी मसख़री जाती रही,
वो आराम से हैं
जो पत्थर के हैं..
मुसीबत तो
एहसास वालों की है..
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