मेरे बारे में---Nirupama Sinha { M,A.{Psychology}B.Ed.,Very fond of writing and sharing my thoughts

मेरी फ़ोटो
I love writing,and want people to read me ! I some times share good posts for readers.

शुक्रवार, 11 फ़रवरी 2022

Indore -Indore !!

  इन्दौर मे सिनेमा तब और अब:--*  

      इंदौर में सिनेमा 1917 में आया था।तब जवाहर मार्ग पर वाघमारे के बाड़े में छोटी छोटी गूँगी अंग्रेजी फिल्में कारबेटर की रोशनी में दिखाई जाती थी।2आने,4आने,6आने,8 आने प्रवेश शुल्क था।प्रोजेक्टर हाथों से घुमाते थे।पर्दे पर द्रृश्य कभी तेज,कभी धीमेनजर आते थे।सिनेमा के परदे के सामने नाचने-गाने वाले बैठते थे और बैकग्राउंड म्यूजिक देते थे।इंटरवल में भी दर्शकों के लिए प्रोग्राम देते थे।दर्शकों के लिए सब कुछ अजूबा और चमत्कार था।
      1918 में नंदलालपुरा में रायल सिनेमा आया,जो टेंट में चलता था।इसी साल सेठ धन्नालाल-मन्नालाल ने मोरोपंत सावे की पार्टनरशिप में बोराड़े थियेटर बनाया।दो शो चलते थे।शाम को अंधेरा होने पर लोग जान-पहचान वालों से नजरें बचाकर पिक्चर देखने जाते थे।
      1922 में नरहरि अड़सुले ने श्रीकृष्ण टाकीज बनाया।बाँस की खपच्चियों और टीन की चद्दरों से यह बना था।बाद में पक्का कराया।1923 में क्राउन टाकीज बना,जिसका नाम बदलकर प्रकाश टाकीज किया गया। 1931 में भारत की पहली बोलती फिल्म आलमआरा श्रीकृष्ण टाकीज में लगी थी।इसको देखने 200 Km दूर से भी लोग आते थे। तीन महीनों तक लगातार चली थी यह फिल्म,क्योंकि पहली बार गूँगा बोलने लगा था।
      1933 से प्रतिदिन 3 शो और 1956 से प्रतिदिन 4 शो चालू हुए।1947 के बाद धीरे धीरे सभी आधुनिक होने लगे और सुख सुविधाएँ बढ़ने लगी।पहले टिकिट दर 2आने से 1रू थी। बाद के सालों में बढ़ते बढ़ते टिकट दर 1रू से 5रू हो गई।चाय-नाश्ते के केंटीन,पान-बीड़ी की दुकानें,साइकिल पार्किंग इत्यादि व्यवस्थाएँ शुरू से रही।इंटरवल में टाकीज के अंदर तक समोसेकचौरी,कुल्फी,मूँगफली,चना जोर गरम बिकता था।अनंत चौदस के दिन 5-5,6-6 शोज़ चलते थे।सुबह 9 बजे से लेकर रात 3 बजे तक लोग पिक्चरें देखते थे।
       1927 में सियागंज कार्नर पर प्रभात टाकीज बना,जिसका नाम बदलकर एलोरा टाकीज किया गया।एलोरा की छत पर अजंता टाकीज भी बना।1934 में रीगल,डायमंड और नीलकमल टाकीज बने।1936 में महाराजा,1942 में मिल्की वे,1946 में सरोज,1947 में भारत/ नवीनचित्रा,और राज टाकीज,1948 में स्टारलिट,1949 में यशवंत,1950 में अलका/ज्योति,1965 में बेम्बिनो,1969 में मधुमिलन बना।इसके बाद कस्तूर,प्रेमसुख,कुसुम,देवश्री-अभिनयश्री,सपना-संगीता,सत्यम,अनूप,आस्था और मनमंदिर टाकीज बने।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

Dharavahik upanyas Bhoot -Adbhut!(21)

Till they were children it was overlooked by all , it was just a children’s play for all , Chandan Singh Kamini Devi and all the staff membe...

Grandma Stories Detective Dora},Dharm & Darshan,Today's Tip !!