*शिव अद्भुत हैं शिव अद्वितीय हैं।*
भगवान शिव के हाथ में "त्रिशूल" है जो मानव मस्तिष्क के 'वेंट्रिकुलर सिस्टम' से हू-ब-हू मिलता है। यह सिस्टम को चलने-फिरने खासकर सिर के अचानक घूमने पर नियंत्रण करने में मस्तिष्क की मदद करता है।
भगवान शिव के सिर पर जो "चाँद" है, वह "हाइपोथैलामस" से लिया गया है। वेंट्रिकुलर सिस्टम के निकट स्थित यह भाग चय-अपचय, हार्मोन के स्राव, मनोभाव, वृद्धि एवं विकास को संयमित करता है।
भगवान शिव के गले में पड़ी रुद्राक्ष की माला मस्तिष्क के "कोरॉयड" "प्लेक्सस" की अनुकृति है। कोरॉयड प्लेक्सस से 'सेरीब्रोस्पाइनल द्रव' स्रवित होता है जिसमें वेंट्रिकल डूबे रहते हैं। कोरॉयड प्लेक्सस से सेरीब्रोस्पाइनल द्रव वेंट्रिकल्स में उसी प्रकार झरता है जिस प्रकार गंगा और उसकी शाखाएं उसकी जटाओं से बहती हैं।
गंगा का एक नाम "त्रिपथगा" भी है। वह तीन मार्गों से होकर गुजरती है, इसीलिए "त्रिपथगा" कहलाती है। जब गंगा स्वर्ग से पृथ्वी पर गिरती है, तब वह शिव की जटाओं में उलझकर सात धाराओं में विभाजित हो जाती है। इनमें से तीन धाराएं सुचक्षु, सीता और सिन्धु के रूप में पश्चिम की ओर तथा नलिनी, पावनी और आह्लादिनी के रूप में पूर्व की ओर जबकि स्वयं गंगा राजा भगीरथ के रथ के साथ-साथ पृथ्वी पर बहती चली आती है। ये तीन वर्ग उसके तीन पथ हैं। गंगा के बारे में यह भी कहा जाता है कि वह स्वर्ग, पृथ्वी और पाताल--तीनों क्षेत्रों में बहती है।
मानव मस्तिष्क और शरीर विज्ञान में "कोरॉयड प्लेक्सस" से "सेरिब्रो स्पाइनल द्रव" भी तीन दिशाओं में बहता है--दाहिने वेंट्रिकल् की ओर, बाएं वेंट्रिकल् की ओर और सेरिब्रोस्पाइनल द्रव तालु के मध्य चौथे वेंट्रिकल् की ओर। यही नहीं, गंगा की सात धाराओं के वैदिक उल्लेख के अनुसार वेन्ट्रीकुलर सिस्टम भी अंदर से दो एंटीरियर, दो पोस्टीरियर और चार हार्न्स से मिलकर बना है। गंगारूपी अंतिम धारा ब्रेनस्टेम और स्पाइनल कॉर्ड (सुषुम्ना नाड़ी) को भी आप्लावित करती है और इनके अंदर के अंगों में जाकर गंगा के पाताल जाने के वैदिक उल्लेख को प्रमाणित करती है।
मस्तिष्क के मध्य में स्थित "पीयूष ग्रन्थि" को ही ऋषियों ने भगवान शिव के "तीसरे नेत्र" के रूप में निरूपित किया है। यह पीयूष ग्रन्थि प्रकाश के प्रति अत्यंत संवेदनशील है और "मेलाटोनिन" नाम के ऐसे हार्मोन का स्राव करती है जिसका मनोभावों, जागृति, चेतना की अवस्थाओं से सम्बन्ध है। वेंट्रिकल्स में झिल्ली जैसी एक रचना है जिसे "स्पेक्टम पेलूसिडम" कहते हैं। यह भगवान शिव के डमरू से मेल खाती है।
स्पैक्टम पेलूसिडम की भावना और प्रेरणा में महत्वपूर्ण भूमिका है। वेंट्रिकल् सिस्टम के सिर और गले के चारों ओर लिम्बक सिस्टिम अपने नाभिक और फोर्निक्स के साथ स्थित है। ये अंग बेसिल गैंगेलिया का हिस्सा है और सहज तथा सामंजस्यपूर्ण गतिशीलता सुनिश्चित करता है। अपने बड़े सिर और लम्बी पूछ के कारण ये बिल्कुल शिव के गले में चारों ओर नाग जैसा रूप निर्मित करता है। तीसरा वेंट्रिकल् भी वेंट्रिकल् सिस्टम का हिस्सा है और मस्तिष्क के मध्य में स्थित है। आकार में वह भगवान शिव के कमण्डल की तरह है।
भगवान शिव की पारंपरिक पूजा में उनके चारों ओर पूर्णवृत के बजाय अर्धवृत्त बनाये जाते हैं। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि मस्तिष्क की आकृति अंग्रेजी के सी (C) अक्षर की तरह है। आज जो वैज्ञानिक अपने शोध और अनुसंधान से प्रभावित करने की कोशिश कर रहे हैं, हमारे योगी प्राक्काल से ही अपनी समाधि अवस्था में उसे जान चुके थे और इसीलिए शिव का आकार, रूप, रंग और उनका पूरा स्वरूप उसी के अनुरूप प्रतिष्ठित किये थे।
भगवान शिव के लिंग के रहस्य के बारे में अनेक भ्रांतियां हैं। अगर योग की दृष्टि से विचार किया जाय तो आदि ब्रह्म भगवान शिव ही हैं। उन्हें परब्रह्म माना गया है। आज पूरे विश्व में भगवान शिव की आराधना होती है, वह भी शिवलिंग के रूप में ।
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