रूस का असली इतिहास
अजेय रूस
बलि के युग में इन्द्र की त्रिलोकी में भारत, चीन और रूस थे।
अतः चीन के लोग अपने देश को मध्य राज्य कहते थे।
भारत उज्जैन से ४५ अंश पश्चिम से ४५ अंश पूर्व तक था। पश्चिमी सीमा से ९० अंश पूर्व वामन का प्रथम पद इण्डोनेसिया (यवद्वीप सहित ७ मुख्य द्वीप) के पूर्व भाग न्यूगिनी पर पड़ा।
दूसरा पद उत्तर ध्रुव या मेरु पर पड़ा।
तीसरा वापस पश्चिमी सीमा पर पड़ा।
रत्नवन्तं यवद्वीपं सप्तराज्योपशोभितम्॥२९॥
यवद्वीपमतिक्रम्य शिशिरो नाम पर्वतः॥३०॥
तत्र पूर्वपदं कृत्वा पुरा विष्णुस्त्रिविक्रमे।
द्वितीयं शिखरे मेरोश्चकार पुरुषोत्तमः॥५८॥
महाभारत में रूस को अजेय कहा गया है, या अपराजितादिक्।
वर्षं हिरण्यकं नाम विवेशाथ महीपते। ------------
अथ जित्वा समस्तांस्तान् करे च विनिवेश्य च। --- शृङ्गवन्तं च कौन्तेयः समतिक्रम्य फाल्गुनः)
उत्तरं कुरुवर्षं तु स समासाद्य पाण्डवः। इयेष जेतुं तं देशं पाकशासननन्दनः॥७॥----
पार्थ नेदं त्वया शक्यं पुरं जेतुं कथञ्चन। उपावर्तस्व कल्याण पर्याप्तमिदमच्युत॥९॥ ---
ततो दिव्यानि वस्त्राणि दिव्यान्याभरणानि च। क्षौमाजिनानि दिव्यानि तस्य ते प्रददुः करम्॥१६॥
(महाभारत सभा पर्व, अध्याय २८-अर्जुन दिग्विजय)
हिरण्यक वर्ष = रूस
(हिरण्य या लाल रंग),
शृङ्गवान् पर्वत (रूस की पूर्वी सीमा पर यूराल पर्वत),
उत्तर कुरु वर्ष (शिविर या साइबेरिया का मध्य भाग)-ओम्स्क नगर प्राचीन शून्य देशान्तर रेखा पर था।
इस रेखा पर उज्जैन के उत्तर भारत का प्रमुख नगर कुरुक्षेत्र था।
सबसे उत्तर का मुख्य नगर उत्तर कुरु था। यहां से पूर्व पश्चिम दिशा में देशान्तर माप का आरम्भ होता है, अतः उत्तर कुरु को ओम् (रूसी भाषा में ओम्स्क) कहते थे।
इसे अपराजिता दिक् कहा गया। वहां के लोगों ने अर्जुन से कहा कि यह जीता नहीं जा सकता है, अतः कुछ उपहार दे कर विदा किया। ये दिव्य वस्त्र थे अर्थात् अति शीत में पहनने के कपड़े जिनकी भारत में कभी आवश्यकता नहीं है।
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