*विवाह संस्कार*
पौराणिक संस्कार ग़लत नहीं। कोई भाषा खराब नहीं है, कोई भी भाषा हो, उसके माध्यम से ही अपनी बात किसी को बताई जाती है। उसी प्रकार कोई धर्म ग़लत नहीं है। सभी धर्मों में अपने-अपने ढंग से विश्लेषण कर परमात्मा के बारे में बताया जाता है। यह बात ग़लत है कि हम दूसरे धर्मों को ग़लत कहें।
हमारे यहां विवाह संस्कार में ऋषि-मुनियों ने संस्कृत के मंत्र गढ़े हैं। इसमें एक-एक मंत्र संदेश है और उस मंत्रों से संस्कार को बांधा गया है।
संसार के सृष्टि के समय न कोई ज्ञानी होगा, न कोई पढ़ा लिखा, न कोई धर्म और न ही कोई मंत्र रहा होगा। उस समय वस्त्र भी नहीं होंगे और न पहनने के बारे में जानकारी रही होगी। क्या खाना चाहिए क्या नहीं, इस संबंध में भी कुछ पता नहीं रहा होगा।
मनुष्य को भूख लगने पर कुछ भी फल मूल, घासफूस, जीवजन्तु जो भी मिले कच्चे खाया, फिर अग्नि की उत्पत्ति हुई तो पका कर खाना शुरु किया। स्त्री-पुरुष में संबंध बढ़ा और आज दुनिया ऐसी है।
यहां विवाह से संबंधित कुछ बातें रखी जा रही है। विवाह की व्याख्या ऋषि श्वेतकेतु ने दी है। उससे पहले नारियां उन्मुक्त थी और पुरुष भी किसी स्त्री के साथ रह सकता था।
श्वेतकेतु एक बार अपने पिता के पास बैठे थे।तभी एक व्यक्ति आया, मां का हाथ पकड़ा और बोला-चलो...। श्वेतकेतु ने मां का हाथ पकड़कर दूसरे पुरुष द्वारा ले जाए जाने पर आपत्ति की।
पिता ने श्वेतकेतु को समझाया कि व्यवस्था यही है। कोई पुरुष किसी भी स्त्री को अपने साथ ले जा सकता है। कोई स्त्री किसी भी पुरुष के साथ जा सकती है।
तब श्वेत केतु ने कहा, यह तो पाप है, अनाचार है। उसके बाद उन्होंने विवाह की व्यवस्था बनाने पर जोर दिया और विवाह की एक स्थायी परम्परा आरम्भ किया गया। जो आजतक चल रही है और समाज एक नियम में बंधकर सुरक्षित है। इस प्रकार विवाह संस्कार दाम्पत्य को सुदृढ़ करता है।
विवाह संस्कार में ही पिता द्वारा बेटी की कन्यादान की परम्परा भी एक बनायी गई है।
वर्तमान समय में लोग अधिक शिक्षित होते जा रहें हैं। इस कारण पूर्वजों द्वारा बताई गई राह को ग़लत बताकर नयी और आधुनिक रीति-रिवाज बनाकर उसका प्रश्रय दिया जा रहा है।
स्वयं को प्रगतिशील और आधुनिक दिखाने की होड़ में भी कुछ लोग नयी परम्परा की नींव डाल रहे हैं। *एक IAS अधिकारी हैं, जिनकी मीडिया में बड़ी वाहवाही हो रही है कि उन्होंने अपने विवाह में पिता को अपना कन्यादान करने से रोक दिया। कहा कि मैं दान की वस्तु नहीं हूँ। कुछ दिन पहले ऐसा ही ज्ञान ‘मान्यवर’ कंपनी के विज्ञापन में आलिया भट्ट द्वारा दिलाया गया था। मानो कन्यादान कोई सामाजिक बुराई है।* लेकिन वो नहीं जानते कि इस परंपरा का अर्थ क्या है?
परम्परा के अनुसार हिंदू विवाह के कुल 22 चरण होते हैं। कन्यादान इसमें सबसे महत्वपूर्ण है। अग्नि को साक्षी मानकर लड़की का पिता/अभिभावक अपनी बेटी के गोत्र का दान करता है। इसके बाद बेटी अपने पिता का गोत्र छोड़कर पति के गोत्र में प्रवेश करती है। कन्यादान का यह अर्थ नहीं कि ऐसा करके पिता बेटी को दान कर देता है। कन्यादान हर पिता का धार्मिक कर्तव्य है। इस दौरान जो मंत्रोच्चार होता है उसमें पिता होने वाले दामाद से वचन लेता है कि आज से वह उसकी बेटी की सभी ख़ुशियों का ध्यान रखेगा।
ऐसी भावुक रस्म को भी वामपंथी मूर्खता का शिकार बनाया जा रहा है। ऐसे लोगों को नहीं पता कि हिंदू धर्म के विवाह मंत्रों की रचना किसी पुरुष ने नहीं, बल्कि विदुषी सूर्या सावित्री ने की थी। कन्यादान को लेकर अभियान चलाने वालों की बुद्धि पर तरस खाना अनुचित नहीं होगा। ऐसे IAS-IFS अधिकारी और उनकी आधुनिक विचारों पर वाह-वाह करने वाला मीडिया, समाज और धर्म का कितना अहित कर रहे हैं।
आजकल के बच्चे और समाज के लोग आधुनिक दिखाने के फेर में सिनेमा, टीवी की नकल कर रहें हैं और अपनी परम्परागत सभ्यता को तोड़मरोड़ कर पेश किया जा रहा है। जैसे रिंग सेरेमनी, जयमाल, औरतों को भी बारात में जाना, स्वयं के नाचने गाने की विभिन्न परिपाटी का चलन आरम्भ हो चला है। यह ठीक है या नहीं, इस पर कौमेट भी करना उचित नहीं है। इस परिपाटी को सिर्फ देख सकतें हैं, बदलने की क्षमता नहीं है। युग बदला है, हम बदलेंगे वाली कहावत का बोलबाला है।
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