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रविवार, 17 अप्रैल 2022

Dharm & Darshan !! Ek Bodhkatha !!

 प्रसिद्ध बोधकथा है कि "एक नगर में एक लकड़हारा रहता था। बहुत थन उसके पास न था। रोज की रोटी के लिए रोज ही परिश्रम करना पड़ता था, उससे उसको कोई परेशानी न होती थी, उल्टा वह उस परिश्रम को करके प्रसन्न ही रहा करता था।


एक दिन रानी ने उसको इतना प्रसन्नचित्त देखा तो राजा से कहा- "इस व्यक्ति के पास ऐसा क्या है, जिसके कारण वह इतना खुश है?" राजा बोले- "यह परिश्रम करता है, संतोष में है।" इसे धन दे दो तो यह परेशान हो जाएगा। रानी को लगा कि ऐसा कैसे संभव है? धन मिलेगा तो खुश होएगा, परेशान क्यों होयेगा?


रानी को सत्य का साक्षात्कार कराने के लिए राजा ने चुपचाप उस लकड़हारे के घर में एक सोने की अशर्फियां से भरी हांडी रखवा दी। घर आने पर लकड़हारे ने देखा कि स्वर्ण से भरा एक बरतन घर में रखा है तो उसके उल्लास का ठिकाना न रहा। उसने तुरंत सारी अशरफियां गिननी शुरू की तो वो 99 निकली। अब उसका मुंह लटक गया। उसे लगा की सौ अशर्फियां होती तो कितना अच्छा होता।


अगले दिन से उसने एक असर्फी को पूरा करने हेतु कमाने की दौड़ में लग गया। धीरे-धीरे चिन्ता से उसका चेहरा सूख गया। मुंह की कांति चली गई। चेहरे से मुस्कुराहट-हंसी विदा हो गई। अब राजा ने रानी को याद दिलाया कि देखिए महारानी! यह वही लकड़हारा है, जो एक पैसा कमा कर खुश रहता था और आज 99 के फेर में ऐसा अटका है कि खुश रहना भूल गया है।"


लालची मनुष्य कुछ इसी तरह की दौड़ में उलझा रहता है। उसका मन इसी तरह भौतिक वस्तुओं को पाने की दौड़ में बंध जाता है। 


*श्रीभगवान गीता में कहते हैं कि ऐसी प्रवृत्ति वाले मनुष्य सोचते हैं कि आज इतनी वस्तुएं तो प्राप्त कर ली है, कल शेष मनोरथ को भी पूरा कर लेंगे। सत्य तो यह है कि वह कल कभी भी नहीं आता।*


 ऐसा नहीं है कि इस बंधन से मात्र अमीर बंधते हैं, इस बंधन से वे भी बंध जाते हैं जिनके पास धन की कमी है। वैसे व्यक्ति को जो मिला है, वह कम जान पड़ता है। 


*शाश्वत सत्य है कि जो अपने को जितना चीजों से जोड़ेगा, उतना गहरे बंधन में बंधते जाएगा और जो अपने को जितना चीजों से तोड़ेगा, वह उतना ही मुक्त हो पायेगा

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