_*आत्मिक ज्ञान है व्यक्तित्व का आधार*_
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चारों ओर से पर्वतीय मालाओं में धीरे मैदानी क्षेत्र पर स्थित एथेंस की खूबसूरत नगरी देखते ही बनती थी।
इमरान का प्रतिष्ठित नगर के चांस है आज दर्शन एवं कला के आधार पर विकसित हुई पश्चिमी मानवीय सभ्यता का प्रमुख केंद्र बन चुका है।
प्रसिद्ध दार्शनिक सुकरात मानवीय सभ्यता के विकासशील कर्म पर अपने दार्शनिक अनुभूतियों के आधार पर प्रकाश डालते हुए शिष्यों से कहने लगे- यहां यह भली प्रकार समझ लेना चाहिए कि संसार को कभी भी एक ही सिद्धांत की परिधि में नहीं बांधा जा सकता है। बदलते समय के साथ साथ समाज की रीति नीति में विवेक सम्मत परिवर्तन करना आवश्यक हो जाता है और यदि ईश्वर से किसी भी प्रकार की उपेक्षा बरती गई हो तो देर सबेर समूचा तंत्र पथभ्रष्ट हो विपत्ति में पड़ जाता है।
उच्च गंभीर विषयों पर अपने मंतव्य शिष्यों के सम्मुख प्रस्तुत करते हुए सुकरात निमग्न थे। तभी एक ज्योतिषी घूमता घूमता वहां आ पहुंचा। भद्र और उदार लग रहे सुकरात व उसके शिष्यों को ध्यानपूर्वक देख ज्योतिषी को एक युक्ति सूझी। उसे लगा कि अपनी विद्या का छद्म प्रयोग करके कुछ धन अर्जित करने का यह उपयुक्त अवसर है।
सुकरात का समक्ष ज्योतिष विद्या के प्रकांड विद्वान होने का दावा करते हुए कहने लगा- मैं अपनी ज्योतिष विद्या के कुशल ज्ञान के आधार पर तुम्हारी आकृति को कुछ समझ पा रहा हूं। यदि चाहो तो मेरे माध्यम से इसे तुम भी जान सकते हो। मात्र चेहरा देखकर किसी भी व्यक्ति का स्वभाव और चरित्र के बारे में बता पाना मेरे लिए बड़ा सहज है। तुम मुझे इसके लिए एक अवसर प्रदान करके देखो।
सुकरात अच्छे दार्शनिक थे, पर दिखने में बिल्कुल सुंदर नहीं थे। अपने बारे में वे खुद भी कहते थे कि मैं बदसूरत हूं। ज्योतिषी के दावे को समर्थन देते सुकरात अपने शिष्यों को देख मुस्कुराए वह उन्हें कहने लगे- तुम सभी आज पहले इससे मेरी आकृति का सत्य सुन लो। इतना कहने के उपरांत सुकरात ठिठके और गंभीर होकर आगे कहने लगे- अपनी आकृति का रहस्य बाद में मैं तुम्हें बताऊंगा। सुकरात ने ज्योतिषी की ओर देखा व सिर इला कर अनुमति देते हुए अपनी विद्या का परीक्षण आरंभ करने का इशारा किया।
ज्योतिषी, सुकरात का चेहरा देखकर उपेक्षित अंदाज में करने लगा- इसके नथूनों की बनावत बता रही है कि इस व्यक्ति में क्रोध की भावना प्रबल है। इसके माथे और सिर की आकृति के कारण यह निश्चित रूप से लालची होगा।
अपने गुरु के संबंध में अपमानजनक टिप्पणी सुन वहां उपस्थित शिष्य नाराज होने लगे व सुकरात से निवेदन करने लगे- महाशय, या व्यक्ति हमें झक्की लगता है। आप आज्ञा दे तो अभी इसकी अकल ठिकाने लगा देते हैं।
सुकरात ने शिष्यों को रोककर ज्योतिषी को निर्भीक होकर अपनी बात आगे बढ़ाने का इशारा किया। ज्योतिषी शिष्यों की बातों को नजरअंदाज करता आगे कहने लगा- इसकी थोड़ी की रचना कहती है कि यह सनकी है। इसके ऑटो और दातों की बनावट के अनुसार यह व्यक्ति सदैव देशद्रोह करने के लिए प्रेरित रहता है।
इस घटना के साक्षी शिष्य सब कुछ देख लिया समझ नहीं पा रहे थे कि आखिर क्यों गुरुदेव इस दुष्ट को अपनी अवज्ञा का अवसर प्रदान किए जा रहे हैं? सुकरात ने ज्योतिषी द्वारा ज्योतिष विद्या के आधार पर स्वयं के संबंध में लगाए गए अनुमानित तथ्यों को बड़े ही ध्यान पूर्वक सुना वह अन्त में ज्योतिषी की प्रशंसा कर उसे इनाम देकर विदा किया। गुरु आदेश से विवश सुकरात के शिष्य गुरु के हुए इस अपमान को चुपचाप सहन करने के कारण अधीर हो रहे थे। वे सभी सुकरात द्वारा ज्योतिषी के प्रति किए गए इस विचित्र व्यवहार से भौंचक्के भी थे।
सुकरात शिष्यों के उलझन को सुलझाते हुए कहने लगे- यथार्थ को छिपाना ठीक नहीं। ज्योतिषी ने मेरे संबंध में जो कुछ बताया, वे सभी दुर्गुण मुझ में है। यही मेरी स्थूल आकृति में निहित सत्य है, किंतु उस ज्योतिषी से एक भूल अवश्य हुई, वह यह कि उसने मेरी आत्मिक ज्ञान की शक्ति पर जरा भी गौर नहीं किया। उस ज्ञान की मदद से मैं निरंतर अपने विवेक को जागृत रखकर अपने समस्त दुर्गुणों पर अंकुश लगाए रखता हूं।
सुकरात का संसदीय आचरणोन्मुख रहा था। सुकरात को भौतिक शिक्षा और आचरण द्वारा उदाहरण देना ही पसंद था। उन्हें हवाई बहस बिल्कुल पसंद न थी। यूनान में गंभीर विद्वान और ख्याति प्राप्त हो जाने पर भी वे सामान्य स्थिति में ही रहे। ज्ञान का संग्रह और प्रसार ही उनके जीवन का उद्देश्य था।
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