भागलपुर की चम्पा नदी इस साल जैसे कोई बदला लेकर आई थी। सावन-भादो की बरसात तो हर साल होती थी, मगर इस बार पानी में एक अलग ही बेरहमी थी। शाम ढलते-ढलते नदी का पानी गाँव की गलियों में ऐसे चढ़ आया जैसे कोई पुराना हिसाब चुकाने आया हो। पहले निचले हिस्से के घर डूबे, फिर बुनकर मोहल्ले की गलियों में पानी का झागदार बहाव घुस आया। लकड़ी के करघों की टक-टक-टक की लय, जो सुबह से रात तक गलियों में गूँजती थी, एक झटके में थम गई।
हर घर में करघा था, हर आँगन में बुनाई की महक। इस बार तो दुर्गापूजा और दिवाली के लिए अच्छे ऑर्डर मिले थे। रंग-बिरंगी, सुनहरी जरी से सजी साड़ियों के सपने हर घर में बुने जा रहे थे। साहूकारों ने भी खुले दिल से धागा दिया था—“त्योहार पर साड़ियाँ बिक जाएँगी, पैसा बाद में दे देना।” बीस-बीस हज़ार रुपये का रेशमी धागा हर बुनकर के घर में चमक रहा था। मगर किस्मत को शायद यह चमक रास नहीं आई।
रात भर पानी बढ़ता रहा, और सुबह तक करघे पानी में डूब गए। धागे की गठरियाँ भीगकर भारी हो गईं, उनके रंग बहकर कीचड़ में मिल गए। अधूरी साड़ियाँ लहरों में फँसी किसी घायल पंछी की तरह तैर रही थीं। बुनकर परिवारों ने धागे को सुखाने की कोशिश की, लेकिन पानी के दाग ऐसे थे जो कभी नहीं उतरने वाले थे।
साहूकार का चेहरा अब बदल चुका था। कल तक जो दोस्ती में कंधे पर हाथ रखता था, आज सख़्त आवाज़ में कह रहा था—“धागा तो लिया है, पैसा तो देना पड़ेगा।” बुनकरों के लिए यह डूबा हुआ धागा अब कर्ज़ का बोझ बन गया। उधर, बाजार से खबर आई कि ऑर्डर रद्द हो गए हैं—क्योंकि त्योहार पर समय से माल नहीं पहुँच पाएगा।
गंगाराम बुनकर की सबसे छोटी बेटी पूनम, जो दिवाली पर नई चूड़ियाँ पहनने का सपना देख रही थी, अब अपने पिता से बार-बार पूछती—“बाबू, चूड़ियाँ कब लाओगे?” गंगाराम उसकी आँखों में झाँकते और मुस्कुराने की कोशिश करते, मगर होंठों पर मुस्कान आते-आते टूट जाती। घर का चूल्हा ठंडा था, और आँगन में भीगे करघे की लकड़ी से एक अजीब सी गंध आ रही थी—मानो बरसों का साथी दम तोड़ रहा हो।
आख़िरी उम्मीद लेकर बुनकरों का जत्था जिला उद्योग केंद्र पहुँचा—सोचा शायद बाढ़ राहत योजना से कुछ मदद मिल जाए, ताकि करघा फिर खड़ा हो सके। मगर वहाँ से ठंडी आवाज़ आई—“आपकी श्रेणी में कोई बाढ़ राहत योजना नहीं है।” यह सुनकर लोगों को लगा जैसे पानी दूसरी बार आ गया हो, इस बार आँखों में।
पानी धीरे-धीरे उतर गया, मगर बुनकर मोहल्ले की गलियों में जो सन्नाटा बस गया, वह अब भी कायम है। न बुनाई की आवाज़, न हँसी-ठिठोली—बस टूटे करघे, भीगे धागे, और सूखते सपनों की चुप्पी। गंगाराम अपने करघे को देखते हुए सोचते हैं—“अगर अब कोई हाथ पकड़ने वाला न मिला, तो भागलपुर की यह बुनाई सिर्फ़ किताबों में रह जाएगी, उन हाथों में नहीं जो पीढ़ियों से इसे जीवित रखे थे।”
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