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शनिवार, 20 जून 2026

Gathari aur Thathari !!

जब आते हैं संसार में हम ,

नर्स कहो या दाई माँ , 

नहला धुला कर ,

साफ़ सुथरे कपड़े में ,

बना देती है हमारी छोटी सी सुरक्षित सी गठरी ,

और माँ के पास लिटा देती है , 

माँ कौतुक से देखती है पूरी ममता उँड़ेल कर , 

नौ माह सींचा जिसे रक्त से , 

यही है वो परिणति !

नहीं बदलती है ना की दृष्टि , 

संतान पहली हो दूसरी या छठी , 

उसके लिए समान होती है ,

उसकी अनुकृति ,

इस गठरी से निकल कर , 

इस गोद से उस गोद करते करते ,

हम बचपन से युवा हो जाते हैं ,

और अब हमारी पीठ पर भी , 

धर दी जाती है ज़िम्मेदारी कि भारी भरकम गठरी ,

हम जुटे रहते हैं हरदम , जिम्मेदारियों की कम ,

और संपन्नता की बढ़ाने में गठरी , 

कब बालों में सफ़ेदी और चेहरे पर झुर्रियाँ आईं , 

खबर भी नहीं होती ,

कल तक के क़द्दावर जवान अब बन जाते हैं ठठरी ,

कई बीमारियों के देसी विदेसी इलाज कराते कराते ,

एक दिन चल देते हैं वहीं ,

जहां से आये थे कभी ,

और माँ की बग़ल में रखे गए थे बना कर गठरी ,

लोग बड़ी तेजी में होते हैं , 

अपने काँधों पर उठाने को हमारी ठठरी , 

न चल कर आये थे न चल कर जा रहे है मरघट ,

छोड़ कर धन दौलत की जमा की गई गठरी !! 

 

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