जब आते हैं संसार में हम ,
नर्स कहो या दाई माँ ,
नहला धुला कर ,
साफ़ सुथरे कपड़े में ,
बना देती है हमारी छोटी सी सुरक्षित सी गठरी ,
और माँ के पास लिटा देती है ,
माँ कौतुक से देखती है पूरी ममता उँड़ेल कर ,
नौ माह सींचा जिसे रक्त से ,
यही है वो परिणति !
नहीं बदलती है ना की दृष्टि ,
संतान पहली हो दूसरी या छठी ,
उसके लिए समान होती है ,
उसकी अनुकृति ,
इस गठरी से निकल कर ,
इस गोद से उस गोद करते करते ,
हम बचपन से युवा हो जाते हैं ,
और अब हमारी पीठ पर भी ,
धर दी जाती है ज़िम्मेदारी कि भारी भरकम गठरी ,
हम जुटे रहते हैं हरदम , जिम्मेदारियों की कम ,
और संपन्नता की बढ़ाने में गठरी ,
कब बालों में सफ़ेदी और चेहरे पर झुर्रियाँ आईं ,
खबर भी नहीं होती ,
कल तक के क़द्दावर जवान अब बन जाते हैं ठठरी ,
कई बीमारियों के देसी विदेसी इलाज कराते कराते ,
एक दिन चल देते हैं वहीं ,
जहां से आये थे कभी ,
और माँ की बग़ल में रखे गए थे बना कर गठरी ,
लोग बड़ी तेजी में होते हैं ,
अपने काँधों पर उठाने को हमारी ठठरी ,
न चल कर आये थे न चल कर जा रहे है मरघट ,
छोड़ कर धन दौलत की जमा की गई गठरी !!
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