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गुरुवार, 2 जुलाई 2026

Dharm & Darshan :: Hanuman Calisa !!

प्रस्तुत है श्रीहनुमान चालीसा (अर्थ सहित), जो आपको सहज रूप से मिलेगा नहीं और इसे पढ़ने के बाद हनुमान चालीसा और रुचिकर लगेगा।


दोहा ~ 

श्री गुरु चरण सरोज रज, 

निज मन मुकुरु सुधारि।

बरनऊँ रघुवर बिमल जसु, 

जो दायकु फल चारि॥


अर्थ : गुरु के चरणों की धूल से अपने मन रूपी दर्पण को पवित्र करके श्रीराम के निर्मल यश का वर्णन करता हूँ, जो धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—इन चारों पुरुषार्थों को प्रदान करता है।


बुद्धिहीन तनु जानिके, 

सुमिरौं पवन कुमार।

बल बुद्धि विद्या देहु मोहिं, 

हरहु कलेश विकार॥


अर्थ : हे पवनपुत्र हनुमान! मैं स्वयं को बुद्धिहीन और निर्बल जानकर आपका स्मरण करता हूँ। मुझे बल, बुद्धि और ज्ञान प्रदान करें तथा मेरे सभी दुःख, दोष और विकारों का नाश करें।


चौपाइयाँ ~ 

1.

जय हनुमान ज्ञान गुण सागर।

जय कपीस तिहुँ लोक उजागर॥


अर्थ : हे हनुमान जी! आपकी जय हो। आप ज्ञान और गुणों के अथाह सागर हैं। तीनों लोकों में आपकी कीर्ति प्रकाशित है।

2.

राम दूत अतुलित बलधामा।

अंजनी पुत्र पवनसुत नामा॥


अर्थ : आप श्रीराम के दूत, अतुलनीय बल के धाम, माता अंजनी के पुत्र और पवनदेव के सुपुत्र हैं।

3.

महावीर विक्रम बजरंगी।

कुमति निवार सुमति के संगी॥


अर्थ : आप महान पराक्रमी हैं। आप बुरी बुद्धि का नाश करते हैं और सद्बुद्धि वालों के सहायक हैं।

4.

कंचन बरन बिराज सुबेसा।

कानन कुण्डल कुंचित केसा॥


अर्थ : आपका स्वर्ण के समान तेजस्वी वर्ण है। आप सुंदर वस्त्र, कानों में कुण्डल और घुँघराले केशों से सुशोभित हैं।

5.

हाथ वज्र और ध्वजा विराजे।

काँधे मूँज जनेऊ साजे॥


अर्थ : आपके हाथ में वज्र और ध्वजा शोभायमान हैं तथा कंधे पर मूँज का यज्ञोपवीत सुशोभित है।

6.

शंकर सुवन केसरी नंदन।

तेज प्रताप महा जग वंदन॥


अर्थ : आप भगवान शंकर के अंशावतार और केसरी के पुत्र हैं। आपका तेज और पराक्रम पूरे संसार में वंदनीय है।

7.

विद्यावान गुणी अति चातुर।

राम काज करिबे को आतुर॥


अर्थ : आप विद्वान, गुणवान और अत्यंत बुद्धिमान हैं। आप सदैव श्रीराम के कार्य करने के लिए तत्पर रहते हैं।

8.

प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया।

राम लखन सीता मन बसिया॥


अर्थ : आपको श्रीराम की कथा सुनने में अत्यंत आनंद मिलता है। श्रीराम, सीता और लक्ष्मण सदैव आपके हृदय में विराजमान हैं।

9.

सूक्ष्म रूप धरि सियहिं दिखावा।

बिकट रूप धरि लंक जरावा॥


अर्थ : आपने छोटा रूप धारण कर माता सीता को दर्शन दिए और विशाल रूप धारण कर लंका को जला दिया।

10.

भीम रूप धरि असुर संहारे।

रामचन्द्र के काज संवारे॥


अर्थ : आपने विकराल रूप धारण कर राक्षसों का संहार किया और श्रीराम के सभी कार्य सफल बनाए।

11.

लाय सजीवन लखन जियाए।

श्री रघुवीर हरषि उर लाए॥


अर्थ : आपने संजीवनी बूटी लाकर लक्ष्मण जी के प्राण बचाए। इससे प्रसन्न होकर श्रीराम ने आपको हृदय से लगा लिया।

12.

रघुपति कीन्हीं बहुत बड़ाई।

तुम मम प्रिय भरत सम भाई॥


अर्थ : श्रीराम ने आपकी बहुत प्रशंसा करते हुए कहा कि तुम मुझे भरत के समान प्रिय हो।

13.

सहस बदन तुम्हरो जस गावैं।

अस कहि श्रीपति कंठ लगावैं॥


अर्थ : श्रीराम ने कहा कि तुम्हारे यश का वर्णन हजार मुख भी पूर्ण रूप से नहीं कर सकते, और यह कहकर ह्रदय से लगा लिया।

14.

सनकादिक ब्रह्मादि मुनीसा।

नारद सारद सहित अहीसा॥


अर्थ : सनकादि ऋषि, ब्रह्मा, नारद, सरस्वती और शेषनाग आदि सभी आपकी महिमा का गुणगान करते हैं।

15.

जम कुबेर दिगपाल जहाँ ते।

कबि कोबिद कहि सके कहाँ ते॥


अर्थ : यमराज, कुबेर, दिग्पाल, विद्वान और महान कवि भी आपके यश का पूर्ण वर्णन नहीं कर सकते।

16.

तुम उपकार सुग्रीवहि कीन्हा।

राम मिलाय राजपद दीन्हा॥


अर्थ : आपने सुग्रीव को श्रीराम से मिलाकर उनका राज्य वापस दिलाया।

17.

तुम्हरो मंत्र विभीषण माना।

लंकेश्वर भए सब जग जाना॥


अर्थ : विभीषण ने आपका परामर्श माना और लंका के राजा बने। यह बात समस्त संसार जानता है।

18.

जुग सहस्त्र जोजन पर भानू।

लील्यो ताहि मधुर फल जानू॥


अर्थ : बाल्यकाल में आपने दूर स्थित सूर्य को मीठा फल समझकर निगलने का प्रयास किया।

19.

प्रभु मुद्रिका मेलि मुख माहीं।

जलधि लांघि गये अचरज नाहीं॥


अर्थ : श्रीराम की मुद्रिका मुख में रखकर आपने समुद्र पार किया। आपके लिए यह कोई आश्चर्य की बात नहीं थी।

20.

दुर्गम काज जगत के जेते।

सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते॥


अर्थ : आपकी कृपा से संसार के कठिन से कठिन कार्य भी सरल हो जाते हैं।

21.

राम दुआरे तुम रखवारे।

होत न आज्ञा बिनु पैसारे॥


अर्थ : आप श्रीराम के द्वार के रक्षक हैं। आपकी अनुमति के बिना वहाँ प्रवेश नहीं मिल सकता।

22.

सब सुख लहै तुम्हारी सरना।

तुम रक्षक काहू को डरना॥


अर्थ : जो आपकी शरण में आता है, उसे सभी सुख प्राप्त होते हैं। जब आप रक्षक हों तो किसी भय का स्थान नहीं रहता।

23.

आपन तेज सम्हारो आपै।

तीनों लोक हाँक ते काँपै॥


अर्थ : अपने तेज को केवल आप ही नियंत्रित कर सकते हैं। आपकी गर्जना से तीनों लोक काँप उठते हैं।

24.

भूत पिशाच निकट नहिं आवै।

महावीर जब नाम सुनावै॥


अर्थ : जहाँ आपका नाम लिया जाता है, वहाँ नकारात्मक शक्तियाँ पास नहीं आतीं।

25.

नासै रोग हरै सब पीरा।

जपत निरंतर हनुमत बीरा॥


अर्थ : आपके निरंतर स्मरण से रोग और पीड़ाएँ दूर होती हैं।

26.

संकट तें हनुमान छुड़ावै।

मन क्रम बचन ध्यान जो लावै॥


अर्थ : जो मन, वचन और कर्म से आपका स्मरण करता है, उसे आप सभी संकटों से मुक्त करते हैं।

27.

सब पर राम तपस्वी राजा।

तिनके काज सकल तुम साजा॥


अर्थ : श्रीराम सर्वोच्च हैं और उनके सभी कार्य आपने सफलतापूर्वक पूर्ण किए।

28.

और मनोरथ जो कोई लावै।

सोई अमित जीवन फल पावै॥


अर्थ : जो भक्त सच्चे मन से अपनी इच्छा लेकर आपकी शरण में आता है, उसे उत्तम फल प्राप्त होता है।

29.

चारों जुग परताप तुम्हारा।

है परसिद्ध जगत उजियारा॥


अर्थ : आपका यश चारों युगों में प्रसिद्ध है और समस्त संसार को प्रकाशित करता है।

30.

साधु संत के तुम रखवारे।

असुर निकंदन राम दुलारे॥


अर्थ : आप संतों की रक्षा करते हैं, दुष्टों का नाश करते हैं और श्रीराम के अत्यंत प्रिय हैं।

31.

अष्ट सिद्धि नौ निधि के दाता।

अस बर दीन जानकी माता॥


अर्थ : माता सीता के वरदान से आप अपने भक्तों को अष्ट सिद्धियाँ और नौ निधियाँ प्रदान करने में समर्थ हैं।


अष्ट सिद्धियाँ ~ 


अणिमा – अति सूक्ष्म होना।

महिमा – अत्यंत विशाल होना।

गरिमा – अत्यधिक भारी होना।

लघिमा – अत्यंत हल्का होना।

प्राप्ति – इच्छित वस्तु प्राप्त करना।

प्राकाम्य – इच्छानुसार कार्य सिद्ध करना।

ईशित्व – शासन करने की शक्ति।

वशित्व – नियंत्रण एवं प्रभाव कीनिधियाँ।


 नौ निधियाँ  ~

महापद्म — अपार धन, वैभव और समृद्धि का प्रतीक।

पद्म — लक्ष्मी, ऐश्वर्य, सुख और सौभाग्य का प्रतीक।

शंख — यश, मंगल, प्रतिष्ठा और शुभता का प्रतीक।

मकर — शक्ति, साहस, सुरक्षा और प्रभाव का प्रतीक।

कच्छप — स्थिरता, धैर्य और सुरक्षित धन का प्रतीक।

मुकुन्द (या कुन्द) — आनंद, संतोष और आध्यात्मिक समृद्धि का प्रतीक।

नन्द — परिवार की वृद्धि, प्रसन्नता और समृद्धि का प्रतीक।

नील — दुर्लभ रत्न, ज्ञान, सौंदर्य और उच्च मूल्य का प्रतीक।

खर्व (या खरवा) — संचित धन, स्थायी संपत्ति और सुरक्षित संसाधनों का प्रतीक।


32.

राम रसायन तुम्हरे पासा।

सदा रहो रघुपति के दासा॥


अर्थ : आपके पास श्रीराम-भक्ति रूपी अमृत है और आप सदैव श्रीराम के सेवक बने रहते हैं।

33.

तुम्हरे भजन राम को पावै।

जनम जनम के दुख बिसरावै॥


अर्थ : आपका भजन करने से श्रीराम की कृपा प्राप्त होती है और अनेक जन्मों के दुःख दूर हो जाते हैं।

34.

अंत काल रघुबर पुर जाई।

जहाँ जन्म हरि भक्त कहाई॥


अर्थ : अंत समय श्रीराम के धाम की प्राप्ति होती है और पुनर्जन्म होने पर भी भगवान के भक्त बनते हैं।

35.

और देवता चित न धरई।

हनुमत सेई सर्व सुख करई॥


अर्थ : जो आपकी भक्ति करता है, उसे सभी प्रकार के सुख प्राप्त होते हैं।

36.

संकट कटै मिटै सब पीरा।

जो सुमिरै हनुमत बलबीरा॥


अर्थ : जो आपका स्मरण करता है, उसके सभी संकट और पीड़ाएँ दूर हो जाती हैं।

37.

जय जय जय हनुमान गोसाईं।

कृपा करहु गुरु देव की नाईं॥


अर्थ : हे प्रभु हनुमान! आप पर बार-बार जय हो। कृपया गुरु के समान मुझ पर अपनी कृपा बनाए रखें।

38.

जो सत बार पाठ कर कोई।

छूटहि बंदि महा सुख होई॥


अर्थ : जो श्रद्धापूर्वक बार-बार हनुमान चालीसा का पाठ करता है, वह सभी बंधनों से मुक्त होकर महान सुख प्राप्त करता है।

39.

जो यह पढ़ै हनुमान चालीसा।

होय सिद्धि साखी गौरीसा॥


अर्थ : भगवान शिव साक्षी हैं कि जो श्रद्धा से हनुमान चालीसा का पाठ करेगा, उसे सफलता और सिद्धि प्राप्त होगी।

40.

तुलसीदास सदा हरि चेरा।

कीजै नाथ हृदय मँह डेरा॥


अर्थ : तुलसीदास स्वयं को श्रीराम का सेवक मानते हैं और प्रार्थना करते हैं कि हे हनुमानजी! आप उनके हृदय में सदैव निवास करें।।

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