वस्तुत:*भैरव* भगवान शिव के ही एक उग्र और रक्षक रूप हैं !
*1. भैरव कौन हैं?*
*भैरव = भय + रव*
जो भय को नष्ट कर देते हैं और जो भक्तों की रक्षा के लिए गर्जना करते हैं।
*मुख्य बातें:*
- *स्वरूप*: शिव का रुद्र/संहारक रूप। हाथ में त्रिशूल, डमरू, खप्पर और कुत्ते की सवारी।
- *काम*: नकारात्मकता, तंत्र-बाधा, कर्ज, कोर्ट-कचहरी, भूत-प्रेत से रक्षा करना।
- *भाव*: डरावने दिखते हैं पर भक्तों के लिए सबसे दयालु। "भक्त वत्सल भैरव" कहे जाते हैं।
- *वार*: रविवार और मंगलवार और अष्टमी तिथि इनकी मानी जाती है।
काशी के कोतवाल भी काल भैरव जी ही हैं।
*2. भैरव कितने हैं?*
मुख्य रूप से *2 प्रकार* के भैरव माने जाते हैं:
*A. अष्ट भैरव - 8 भैरव*
ये शिव के 8 प्रमुख रूप हैं। तंत्र और रक्षा के लिए पूजे जाते हैं।
नाम काम
**1. असितांग भैरव** कला और सृजन के स्वामी
**2. रुरु भैरव** रोग और कर्ज मिटाते हैं
**3. चंड भैरव** शत्रु और मुकदमे में विजय
**4. क्रोध भैरव** क्रोध पर नियंत्रण, तंत्र बाधा
**5. उन्मत्त भैरव** मानसिक शांति, भय दूर
**6. कपाल भैरव** पाप नाश, मोक्ष
**7. भीषण भैरव** भूत-प्रेत, नकारात्मक ऊर्जा
**8. संहार भैरव** बुरी आदतों और कर्मों का संहार
*B. बटुक भैरव*
ये अष्ट भैरव के ही बाल रूप हैं। बहुत सौम्य और जल्दी प्रसन्न होने वाले। विद्यार्थी और व्यापारियों की रक्षा करते हैं।
*C. कुल 64 भैरव*
तंत्र शास्त्र में बताया है कि *64 भैरव* हैं।
- *8 अष्ट भैरव x 8 = 64 भैरव*
- ये अलग-अलग लोकों और दिशाओं की रक्षा करते हैं।
*3. सबसे प्रसिद्ध कौन?*
1. *काल भैरव* - काशी के कोतवाल। बिना इनकी इजाजत काशी में प्रवेश नहीं मिलता।
2. *बटुक भैरव* - घर में पूजा के लिए सबसे आसान।
3. *स्वर्णाकर्षण भैरव* - धन और कर्ज के लिए।
*संक्षेप में*:
भैरव = शिव का रक्षक रूप
मुख्य = 8 अष्ट भैरव
विस्तार = 64 भैरव
और बटुक भैरव सबसे प्रिय है !!
बटुक भैरव भगवान शिव के बाल रूप हैं। ये बहुत सौम्य, शांत और जल्दी प्रसन्न होने वाले माने जाते हैं।
*पहचान:*
- *रूप*: बालक जैसा, शांत मुख
- *वस्त्र*: गेरुआ/बाघ की खाल, रुद्राक्ष माला
- *हाथ में*: त्रिशूल और डमरू
- *सवारी*: काला कुत्ता साथ में
- *काम*: रक्षा, भय दूर करना, विद्यार्थियों और व्यापारियों के लिए विशेष फलदायी
मंगलवार और रविवार को इनकी पूजा करने से कोर्ट-कचहरी, कर्ज और नकारात्मक ऊर्जा से रक्षा मिलती है।
*ॐ ह्रीं बटुकाय आपदुद्धारणाय कुरू कुरू बटुकाय ह्रीं ॐ*
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