Saudi Arabian Urdu Shayara Asna Badr —-
वो कैसी औरतें थीं..
जो गीली लकड़ियों को फूँक कर
चूल्हा जलाती थीं..
जो सिल पर सुर्ख़ मिर्चें पीस कर
सालन पकाती थीं..
सुबह से शाम तक मसरूफ़
लेकिन मुस्कुराती थीं..
जो अपनी बेटियों को
स्वेटर बुनना सिखाती थीं..
दुआएँ फूँक कर बच्चों को
बिस्तर पर सुलाती थीं
और अपनी जा-नमाज़ें मोड़ कर
तकिया लगाती थीं
कोई साहिल जो दस्तक दे
उसे खाना खिलाती थीं..
पड़ोसन माँग ले कुछ
बा-ख़ुशी देती दिलाती थीं
जो रिश्तों को बरतने के
कई नुस्ख़े बताती थीं
गल्ली मोहल्ले में कोई मर जाए
तो आँसू बहाती थीं..
कोई बीमार पड़ जाए
तो उस के पास जाती थीं
कोई तेहवार हो
तो ख़ूब मिल-जुल कर मनाती थीं
वो कैसी औरतें थीं..
किसी बरामदे के ताक़ पर
बावर्ची ख़ानों में
मगर अपना ज़माना साथ ले कर
खो गई हैं वो
क्या किसी इक क़ब्र में
सारी की सारी सो गई हैं वो..
वो कैसी औरते थी..
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