कांपते हाथों को देखा
तो पहली बार उम्र नजर आई।
वरना इस चेहरे से हर चोट
दुनियां से छुपाई।
कितने तानें हिस्से आई
कितनी कड़वी बातें आईं।
जुबां तक पहुंचे लफ़्ज़ मगर
होठों ने शिकायत न सुनाई।
वक़्त चेहरे पर उतरआया
थकान आंखों में समाई।
फिरभी जिम्मेदारियों की
गठरी मैंने कहां हटाई।
एक दिन यह कांपते हाथ
आराम की चादर ओढ़ लेंगे।
तब शायद सब मेरी
खामोशी के मायने खोज लेंगे।
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