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शुक्रवार, 5 अगस्त 2016

Dard--2.

दर्द----2
परिभाषित नहीं किया जा सकता है दर्द ,
क्योंकि हर एक का अलग अलग होता है दर्द,
जब जन्म देती है माँ ,तो सहती है दर्द,
लेकिन अलग अलग हो जाता है,जन्म के बाद,
माँ का और संतान का दर्द ,
माँ साँझा नहीं कर सकती संतान का दर्द ,
ना ही संतान साँझा कर सकती है माँ का दर्द ,
बल्कि यूँ कहें कि,दर्द में साँझेदारी नहीं चलती ,
सबको सहन होता है ,अपने अपने हिस्से का दर्द ,
शरीर पर चोट,गंभीर बीमारी ,डॉक्टर का नश्तर
या फिर असफलता का दर्द,
जब भी मैं देखती हूँ या सुनती हूँ तुम्हारा दर्द
तो मुझे भी होता है दर्द
मेरा दर्द,तुम्हारा दर्द,सबका अलग अलग होता है दर्द
दिखता नहीं है दर्द ,भगवान् की तरह ,हवा की तरह ,
लेकिन हर इंसान की ज़िन्दगी में पूरा दखल रखता है दर्द ,
अनचाहे मेहमान सा ,कभी भी ,आ धमकता है दर्द
जब तक ज़िन्दगी है ,लगा ही रहता है आना जाना इसका ,
बड़ा ही बेदर्द होता है ये कमबख्त दर्द !!

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