कद्रदानो की तबियत का अजीब रंग है आज,
बुलबुलों को ये हसरत है के उल्लू न हुए!
बुलबुलों को ये हसरत है के उल्लू न हुए!
रश्क से देखे न क्यों, याराने मयखाना मुझे,
सबको जामे मय मिला आँखों का पैमाना मुझे!–हाफिज बनारसी—
सबको जामे मय मिला आँखों का पैमाना मुझे!–हाफिज बनारसी—
चश्मे साकी में खुमार आते ही पैमाना बना,
हाथ अंगडाई को उठे और मयखाना बना !—आरज़ू लखनवी–
हाथ अंगडाई को उठे और मयखाना बना !—आरज़ू लखनवी–
न यह शीशा न यह सागर न यह पैमाना बने,
जान ए मयखाना बने तेरी नर्गिसे मस्ताना बने !—असगर गोंडवी—
जान ए मयखाना बने तेरी नर्गिसे मस्ताना बने !—असगर गोंडवी—
मौसमे गुल में अजब रंग है मयखाने का,
शीशा झुकता है कि मुंह चूम ले पैमाने का!
शीशा झुकता है कि मुंह चूम ले पैमाने का!
अब इस चमन का हाल खुद खैर करे,
कसरत है बुलबुलों की तो सय्याद कम नहीं!—अश्क—
कसरत है बुलबुलों की तो सय्याद कम नहीं!—अश्क—
क्या कभी याद आती है हमारी तुमको,
क्या कभी दर्द के मारों का ख्याल आता है!
क्या कभी दर्द के मारों का ख्याल आता है!
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