मेरे बारे में---Nirupama Sinha { M,A.{Psychology}B.Ed.,Very fond of writing and sharing my thoughts

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बुधवार, 9 नवंबर 2016

Late Shri Purushottam Govind Perlekar's Sankalan !!{144}

अब याद आई मेरी आरामे जां इस नामुरादी में,
के कफ़न देना हम भूले थे असबाबे शादी में!

दुनिया में जो मज़े हैं हरगिज ये कम न होंगे,
चर्चे यही रहेंगे,अफ़सोस हम न होंगे!

जिंदगी क्या है,अनासिर में जुहूरे तरतीब,
मौत क्या है इनही अजजा का परेशां होना!


मेरी हर बात को उल्टा वो समझ लेते हैं ,
अब के पूछा तो कह दूंगा हाल अच्छा है!

अहमकों की कुछ कमी नहीं दुनिया में,
एक ढूंढ़ो हजार मिलते हैं,
 ढूंढ़ने की भी जरूरत नहीं,
खुद ब खुद चले आते हैं !

गुंचों के मुस्कुराने में,कहते हैं हंस के फूल,
अपना करो खयाल हमारी तो कट गयी !

रफीकों से रकीब अच्छे ,
जो जल कर नाम लेते हैं,
गुलों से खार बेहतर हैं ,
जो दामन थाम लेते हैं!

उन्हें क्या डराएगी बर्के नशेमन 
जो खुद फूंक कर आशियाँ आ गए हैं!

तू जो चाहे तो उठे सीनाए सहारा से हुबाब,
तेरी कुदरत तो वो है जिसकी हद है न हिसाब!

दिल के फफोले जल गए हसरत के दाग से,
इक घर में आग लग गयी घर के चिराग से!

कहीं वो आके मिटा न दे इंतज़ार का लुत्फ़ 
कहीं कुबूल न हो जाए इल्तजा मेरी!

ऊँचे ऊँचे मुजरिमों की पूछ होगी हश्र में 


कौन पूछेगा मुझे मैं किन गुनाह्गारों  में!

कारसज़े मां   बाफ़िक्रे कारे मां   ,
फ़िक्र मां दरकार मां आजार मां !

 अर्थात—जिसने मुझे बनाया है,जो मेरा उत्पन्न करने वाला है,वह स्वयं मेरी चिंता रखता है,आवश्यकता पड़ने पर ,या रोग या कष्ट आने पर वह उसका उपाय करता है,फिर मुझे फ़िक्र करके अपने को अशांत बनाने की क्या जरूरत है!

“हरचे  बादाबाद ” 

अर्थात—जो होना है सो ह़ोएगा 

हिम्मते मर्दा ,मददे खुदा!

वस्ल में हिज्र का गम,हिज्र में वस्ल की खुशी,
कौन कहता है जुदाई से विसाल अच्छा है!

शिकवा न यार से न शिकायत रकीब से,
जो कुछ हुआ खुदा से या नसीब से !

जिन्हें है इश्क सादिक वह कहाँ फ़रियाद करते हैं,
लबों पर मोहर खामोशी दिलों में याद करते हैं,
फिराके यार में दिन जिंदगी में अपनी भरते हैं,
सिसकते हैं पड़े आशिक न जीते हैं न मरते हैं!

निगाहें डाल कर छुपा लेते हैं चुपके से,
नज़र महबूब की देखो,जफा भी है वफ़ा भी है!
जान दी दी हुई उसी की थी,
हक तो ये है के हक अदा  हुआ !

सरापा आरजू होने ने बनदा कर दिया हमको,
वगरना हम खुदा थे गर दिले बेमुद्दआ होते!

हजारों ख्वहिशें ऐसी कि हर ख्वाहिश पे दम निकले,
बहुत निकले मेरे अरमान फिर भी कम निकले!

मिलना तेरा अगर नहीं आसां तो सहल है,
दुश्कर तो यही है के दुश्वार नहीं!

महफिले हस्ती में किससे यार का पूछूं पता,
शमा भी खामोश है,परवाना भी खामोश है!

मन तू शुदम तू मन शुदी,
मन तन शुदम तू जां शुदी,
टाक्स  गोयद बाद अजी,
मन दीगाराम तू दीगरी!

मुझ में समां जा इस तरह तन प्राण का जो तौर है,
जिससे  कोई कह सके मैं और हूँ तू और है!

जज़्बए इश्क सलामत है तो इंशा अल्लाह,
कच्चे धागे से चले आयेंगे सरकार बंधे!

कहाँ तेरी मंजिल कहाँ है ठिकाना
मुसाफिर बता दे कहाँ तुझको जाना!

खुश्क बातों में कहाँ  शेख कैफे जिंदगी,
वो तो पीकर ही मिलेगा जो मज़ा पीने में है!

पिला दे ओक से साकी,जो मुझसे नफरत है,
प्याला गर नहीं देता, दे,शराब तो दे!—–ग़ालिब

अह्साने नाखुदा का उठाये मेरी बला,
कश्ती खुदा पे छोड़ दूँ ,लंगर को तोड़ दूँ!

तुम्हारी जां से मतलब है दोनों दुनिया में,
 कुछ यहाँ से गरज  कुछ वहां से गरज है!

अगर अपना कहा आप ही समझे तो क्या समझे 

मजा कहने का जब है,एक कहे दूसरा समझे!









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