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बुधवार, 23 मई 2018

Suraj Chachu !! Part 8

सूरज चाचू !!

बढ़ते बढ़ते जा पहुंचा पारा 46.33 पर चाचू 
भट्ठियाँ सी चारों ओर जला रखी है तुमने  चाचू 
कहीं से भी और किसी भी समय झुलस रहे हैं चाचू 
जाने क्रोध कहाँ आ पहुंचा तुम्हारा,आते  आते चाचू 
अमरिका में धरती फेंक रही लावा निरंतर चाचू
जाने मानव से भूल हुई क्या, क्यों दंड भोग रहा चाचू 
धरती भी रूठी सी लगती ,तुम आग फेंकते चाचू 
जो बोलो वो प्रायश्चित कर लेंगे, पछताते हम चाचू 
प्रगति के चरण दर चरण जंगल काटे हैं चाचू
सीमेंट को थोपा है धरती पर,पेड़ कटे हैं चाचू 
जनसँख्या का सैलाब बसाना था ,क्या करते हम चाचू 
तुमसे हम सब,तुमसे धरती माँ ,जीवन पाते चाचू 
जलचर ,नभचर ,थलचर सारे तुमसे ही साँसें लेते चाचू 
नन्हे नन्हे से कीट पतंगे भी उड़ते फिरते चाचू 
हरी भरी सी वनस्पति जीवन दायिनी चाचू 
झुलस रही हैं,क्या सितम बरपा रहे हो चाचू 
क्या KOOL लगते सर्दियों में तुम,हम फ़िदा हो जाते चाचू 
इतने HOT न बन जाओ कि,जल जाये सब चाचू 
थोड़ी तो UNDERSTANDING रख लो 
सबके BOSS हो प्यारे चाचू !!

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