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बुधवार, 16 मई 2018

Wajood Se : Gafil !!

जाने कब से सो रही थी मैं 
थी नींद में गाफिल,
दुनिया में हर कोई सजाता रहा ,
अपनी अपनी महफ़िल ,
ख्वाब मुकम्मल होते रहे सबके ,
मैं कुछ भी न कर सकी हांसिल ,
करती रही खुद से बहस मुबाहिसा,
देती रही खुद को दलील,
खुद ही क़त्ल करती रही ख्वाबों का ,
बन गई खुद की कातिल ,
कश्ती को अपनी डुबोती रही अक्सर 
जब सामने होता था साहिल,
ज़िन्दगी चलती रही मैं भी चलती रही साथ साथ 
तय न थी सो मिली नहीं मंज़िल ,
एक मुश्किल पार की बमुश्किल,
हाज़िर थी दूसरी मुश्किल ,
अलमस्त रही आज में हरदम 
भूल कर अपना मुस्तकबिल !!

गाफिल : खोई हुई,कातिल : हत्यारा ,साहिल : किनारा ,मुकम्मल : पूर्ण।,बहस मुबाहिसा : वाढ विवाद ,अलमस्त : मस्ती में डूबकर ,मुस्तकबिल :भविष्य ,दलील : तर्क 

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