जब चाहता है इंसान ,
कि वक़्त ठहर जाए
तब वो उड़ने लगता है
पंख लगा कर
पलक झपकते ही
गुज़र जाते हैं खुशियों के पल ,
और फिर पसर जाते हैं
सन्नाटे तनहाइयों के ,
जो गुज़ारे नहीं गुज़रते
मानो रुक गई हो घडी
ठहर गया हो वक़्त वहीँ का वहीँ
मुट्ठी से फिसलती रेत सा
या छलनी में पानी भरने की कोशिश सा
शहंशाह है वक़्त ,
चलता है बदस्तूर ,
चलाता है सभी पर,
अपनी मर्ज़ी !!
बदस्तूर : निरंतर
कि वक़्त ठहर जाए
तब वो उड़ने लगता है
पंख लगा कर
पलक झपकते ही
गुज़र जाते हैं खुशियों के पल ,
और फिर पसर जाते हैं
सन्नाटे तनहाइयों के ,
जो गुज़ारे नहीं गुज़रते
मानो रुक गई हो घडी
ठहर गया हो वक़्त वहीँ का वहीँ
मुट्ठी से फिसलती रेत सा
या छलनी में पानी भरने की कोशिश सा
शहंशाह है वक़्त ,
चलता है बदस्तूर ,
चलाता है सभी पर,
अपनी मर्ज़ी !!
बदस्तूर : निरंतर
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