अंजुरी का बचपन माता पिता ,नानी दादी ,और कुछ समय नाना जी के भरपूर प्यार में बीता था। पापा का तहसीलदार होना उस सम्पूर्ण परिवार के लिए गर्व का विषय था। उन दिनों प्रायवेट कान्वेंट स्कूल इक्का दुक्का हुआ करते थे ,लेकिन वे बड़े शहरों में होते थे, तहसील के स्तर पर नहीं हुआ करते थे। इसलिए नहीं कि अंजुरी तहसीलदार साहब की बेटी थी इसलिए उसे विशेष दर्जा मिलता था ,परन्तु वह स्वयं ही बचपन से पढ़ने की शौक़ीन भी थी और अन्य शिक्षणेत्तर गतिविधियों में भी उसकी रूचि थी और वह उनमे बढ़चढ़ कर प्रतिभागी भी होती व उनमे विजयी भी होती रही थी। माता पिता को उसपर गर्व था। उन्होंने उसके लिए बड़े बड़े सपने देखे थे ,किन्तु जाने अंजुरी के भाग्य में क्या लिखा था।
कहा जाता है कि मनुष्य का जन्म उसके कर्म पर आधारित होता है। और पिछले जन्म के कर्मों के अनुसार ही जो भी लेने देने का हिसाब होता है उसी प्रकार उसी अनुकूल उसका जन्म ही नहीं किन्तु उसके जीवन में व्यक्तियों का आगमन भी होता है। कमलेश्वर का आगमन भी शायद इसी प्रकार अंजुरी के प्रारब्ध का ही एक हिस्सा था।
नवरात्रों के अंतिम दिन अंजुरी मम्मी पापा के साथ टेकरी पर देवी माँ के दर्शन करने पहुंची थी। काफी भीड़ थी वहां। मम्मी थक गई थी। अचानक ही "कैसे हैं तहसीलदार साहब ? आवाज़ गूँजी। सभी ने उस ओर देखा ,वे विश्वनाथसिंह थे। अनमोल ठाकुर ने अभिवादन किया और अपनी पत्नी का परिचय कराया,तब तक अंजुरी ने भी उन्हें नमस्ते की। उन्होंने कुछ रूखे अंदाज़ में नमस्ते कहा। कुछ सामान्य सी ही बातें हुईं ,हालाँकि समस्त ज़मीनें तहसील में सूचीबद्ध थीं और रेवेन्यू विभाग भी उनके अंतर्गत ही था ,विश्वनाथसिंह अपने सभी कागज़ी कार्य पूर्णतःनियमतः करके रखते थे।
रात बिस्तर पर अंजुरी सोचती रही ,विश्वनाथसिंह के बारे में ,उनके रूखे से व्यवहार के बारे में ,फिर वह कमल की बातों के बारे में सोचती रही ,वह हमेशा क्यों डरा सा रहता है पापा का उल्लेख होते ही ,क्यों भविष्य की कोई बात नहीं कर पाता ? क्यों उसकी तरह उसके साथ मिलकर भविष्य का कोई सपना नहीं देख पाता ----क्रमशः ------
कहा जाता है कि मनुष्य का जन्म उसके कर्म पर आधारित होता है। और पिछले जन्म के कर्मों के अनुसार ही जो भी लेने देने का हिसाब होता है उसी प्रकार उसी अनुकूल उसका जन्म ही नहीं किन्तु उसके जीवन में व्यक्तियों का आगमन भी होता है। कमलेश्वर का आगमन भी शायद इसी प्रकार अंजुरी के प्रारब्ध का ही एक हिस्सा था।
नवरात्रों के अंतिम दिन अंजुरी मम्मी पापा के साथ टेकरी पर देवी माँ के दर्शन करने पहुंची थी। काफी भीड़ थी वहां। मम्मी थक गई थी। अचानक ही "कैसे हैं तहसीलदार साहब ? आवाज़ गूँजी। सभी ने उस ओर देखा ,वे विश्वनाथसिंह थे। अनमोल ठाकुर ने अभिवादन किया और अपनी पत्नी का परिचय कराया,तब तक अंजुरी ने भी उन्हें नमस्ते की। उन्होंने कुछ रूखे अंदाज़ में नमस्ते कहा। कुछ सामान्य सी ही बातें हुईं ,हालाँकि समस्त ज़मीनें तहसील में सूचीबद्ध थीं और रेवेन्यू विभाग भी उनके अंतर्गत ही था ,विश्वनाथसिंह अपने सभी कागज़ी कार्य पूर्णतःनियमतः करके रखते थे।
रात बिस्तर पर अंजुरी सोचती रही ,विश्वनाथसिंह के बारे में ,उनके रूखे से व्यवहार के बारे में ,फिर वह कमल की बातों के बारे में सोचती रही ,वह हमेशा क्यों डरा सा रहता है पापा का उल्लेख होते ही ,क्यों भविष्य की कोई बात नहीं कर पाता ? क्यों उसकी तरह उसके साथ मिलकर भविष्य का कोई सपना नहीं देख पाता ----क्रमशः ------
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें