अंजुरी और कमलेश्वर दोनों सारी रात सो नहीं पाए। दोनों को ही तरह तरह के विचारों ने कभी दिखाई और कभी किनारा दिखाया। अंजुरी जितनी आत्मविश्वासी लड़की थी। उसने तार्किक दृष्टि से घटी हुई घटना को तौलना शुरू किया। सबसे पहला विचार था कि क्या वह कमलेश्वर को प्यार करती है ? क्या वह उसके योग्य है ? क्या वही उसकी कल्पनाओं का राजकुमार है ? क्या वह बुद्धिमान है ? क्या वह पति के रूप में उसके माता पिता को पसंद होगा ? यह प्रश्न कठिन था किन्तु इसका जवाब भी हाँ ही था। तो फिर समस्या क्या थी ? समस्या यह थी कि दोनों ही पूर्ण वयस्क होने के बावजूद भी आत्मनिर्भर नहीं थे। उसने तब कमलेश्वर की ओर से कुछ प्रश्न पूछे, और उसकी श्रंखला में उसके पिता विश्वनाथ सिंह एक अडिग नकारात्मक दीवार की तरह खड़े थे और साथ ही कमलेश्वर का पिता के सामने अत्यंत भीरु होना ,दूसरी बड़ी दीवार थी। अंजुरी ने सोचा वह कैसे अकेले ही इतने सारे मोर्चों पर लड़ाई लड़ पायेगी। उसके स्वयं के माता पिता ने भी उससे कई अपेक्षाएं रखी होंगी। उन्हें निराशा के अन्धकार में डुबो देना क्या सही है। आखिर अचानक ही यह घटना क्यों घटी। अभी तो उन्हें मिले मात्र एक वर्ष से कुछ अधिक समय ही हुआ है। वे दोनों ही एक दूसरे के बाह्य रूप से आकर्षित हुए हैं ,लेकिन फिर दूसरे विचार ने इस बात को नकार दिया ,क्यूंकि ,उसने न सिर्फ कमलेश्वर के बाह्य रूप को ,अपितु उसके गाम्भीर्य को ,उसके ज्ञान को ,उसकी सज्जनता को उसके व्यवहार को बारीकी से परखा था ,और सभी मानदंडों पर खरा उतरा था कमलेश्वर ,तभी वह उसके मन में बस गया था।
उसने घड़ी देखी रात के दो बजे थे ,उसने सभी विचारों को झटक कर सोचा कि जो कुछ हुआ देवी माँ के सामने हुआ और देवी माँ ही आगे का मार्ग दिखाएंगी।
दूसरे दिन रविवार था इसलिए देर तक सोने से कोई फर्क नहीं पड़ेगा। वह सो गई। सुबह सात बजे नींद खुली ,वह उठ बैठी ,उसने देखा तकिये पर उसके सिन्दूर का सारा रंग लगा हुआ था। वह चिंतित हो गई। वह उसके गिलाफ को उतार कर बाथरूम में घुस गई। गिलाफ को धो कर उसने वहीँ सूखा दिया ,अच्छी तरह नहा कर,बाल भी धो लिये।वह बाहर निकली ,मम्मी रसोई में थी और पापा बरामदे में अखबार पढ़ रहे थे ,वह मम्मी के कमरे में जाकर,सिन्दूर की डिबिया में उंगली डुबा ,कर बालों के भीतर छुपा हुआ सा लगा लिया ,फिर डाइनिंग टेबल पर आ बैठी। ----क्रमशः ---
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