मेरे बारे में---Nirupama Sinha { M,A.{Psychology}B.Ed.,Very fond of writing and sharing my thoughts

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शुक्रवार, 27 मार्च 2020

Dharavahik Upanyas --Anhoni---{57}

अगले दिन अंतिम दो पीरियड्स ऑफ हो गए क्यूंकि सिंधु वर्गीस मैडम को घर जल्दी जाना पड़ा और एक प्रोफ़ेसर श्रीकांत अग्रवाल भी उस दिन ऑफिस की खरीदारी के लिए शहर गए थे। छुट्टी जल्दी हो गई। अंजुरी और कमलेश्वर थोड़ा इधर उधर हो गए और फिर हमेशा की तरह अलग अलग ही टेकरी पर जा पहुंचे। आज मंदिर सूना पड़ा था। अंजुरी ऊपर पहुँच कर देवी माँ के आगे हाथ जोड़ कर खड़ी हो गई। वह आँखे मूंदे माँ से प्रार्थना कर रही थी। कमलेश्वर को जाने क्या सूझी उसने वहां पड़े मिटटी के सकोरे से सिन्दूर की चुटकी भरी और उसे अंजुरी की मांग में भर दिया। अंजुरी ने चौंक कर आंखें खोली ,उसे पल भर तो समझ ही नहीं आया कि क्या हुआ ,उसने अपने दांयें हाथ की उँगलियों से छूकर देखा,ओह ! सिन्दूर ? ये क्या किया तुमने ? अब कमलेश्वर भी सकपका गया ,वह अपनी इस हरकत का कोई स्पष्टीकरण भी नहीं दे पाया।  सन्न रह गई थी ,उसे समझ ही नहीं आ रहा था कि जिस क्षण का उसने हमेशा सपना देखा ,वो जब इस अनपेक्षित से रूप में आया तो उसका सारा आत्म विश्वास कहाँ खो गया। शायद उसने इस प्रकार से घटित होने की अपेक्षा ना की थी। शायद यह एक चोरी की भांति था ,दिन के उजाले सा चमकता हुआ नहीं था। उसने कमलेश्वर का चेहरा देखा ,वह एक अपराधी सा खड़ा था। अंजुरी यह भी ना देख पाई। उसने कमलेश्वर का हाथ पकड़ा और उसे खींचती हुई मंदिर की परिक्रमा लगाने लगी। वह सात परिक्रमा लगा कर कमलेश्वर के साथ देवी माँ के सामने आ खड़ी हुई। उसने मन ही मन पूछा "हे माँ ! ये क्या हो गया ?अब इसे सफल बनाना माँ ! यही प्रार्थना है। 
दोनों ने सर झुका कर प्रणाम किया और अपनी छुपी हुई परिचित जगह आ बैठे। कमलेश्वर ने उसे अपनी ओर खींच लिया, दोनों कुछ क्षणों तक चुपचाप उस नीरव वातावरण में उस घटित के बारे में सोचते रहे। कितनी विचित्र बात थी कि दोनों ही जिस प्रेम के क्षणों के लिए आतुर रहते थे वह अभी काफूर हो चुका था। अंजुरी ने कमलेश्वर से कंघी माँगी ,उसे मालूम था वह एक छोटी कंघी अपने बैक पॉकेट में रखता है। कमलेश्वर ने कंघी निकाल कर दे दी। अंजुरी ने अपने बालों की मांग ही दूसरी ओर कर ली। --क्रमशः --

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