ऐसा लग रहा था कि क्रोध और चिंता दोनों ही संवेग एक साथ काम कर रहे थे। अंजुरी ने पूछा ,"चुप क्यों हो बोलो ? कमलेश्वर बोला ," अंजू ,मैं तुमसे बहुत प्रेम करता हूँ और तुम्हारे बिना जीवन की कल्पना भी नहीं कर सकता, लेकिन-----" लेकिन क्या ? अंजुरी क्रोध से बोली। कमलेश्वर सकपका गया। उसने फिर से बोलना शुरू किया ," मैं आज भी पिता पर निर्भर हूँ " क्या तुम्हारे माता पिता इस सम्बन्ध को स्वीकार कर लेंगे ,मेरा मतलब है ,हमारे नवजीवन आरम्भ में क्या वे हमारी मदद करेंगे ?अब अंजुरी अवाक रह गई ,उसके मानस पटल पर मम्मी पापा के चित्र उभर आये और फिर वह फूट फूट कर रो पडी। कमलेश्वर ने उसे चुप कराने के लिए उसकी पीठ पर हाथ रखा ,जिसे उसने झटक दिया। कमलेश्वर ने फिर से उसके सर पर हाथ रखा और इस बार अंजुरी ने उसे नहीं झटका,कमलेश्वर ने कहा ," देखो अंजू ! मुझे नहीं मालूम उस क्षण में कौनसी शक्ति के आवेग से भर कर मैंने तुम्हारी मांग में सिन्दूर भर दिया। शायद यह विधि का विधान ही था। हाँ अब आगे अवश्य ही हमारे सामने दुरूह मार्ग है और और इस मार्ग पर हम दोनों को साथ ही चलना है। "हम दोनों ही अभी द्वितीय वर्ष में हैं ,अगले वर्ष हम ग्रेजुएट हो जायेंगे ,हम नौकरी पा सकेंगे और अपना नवजीवन आरम्भ कर सकेंगे। आज भले ही हम कानूनी रूप से वयस्क हों किन्तु आत्म निर्भर नहीं हैं और इसीलिये हम अपने माता पिता के कि सामने अपनी हठधर्मिता नहीं दिखा सकते। बुद्धिमानी इसी में है कि हम इस बात को अभी अपने बीच ही रहने दें। अंजुरी समझ ही नहीं पा रही थी कि क्या सही है क्या गलत है ,लेकिन इस समय उसे कमलेश्वर की बात नकार कर कोई दूसरा मार्ग सुझाना भी असंभव लग रहा था। काफी असमंजस की स्थिति में ही वह उठ खड़ी हुई। उसने बताया कि उसके मम्मी पापा दो दिन तक अनुपस्थित हैं और उसकी नानी की तबियत ठीक नहीं है इसलिए शायद मम्मी को अधिक दिनों तक वहां रहना पड़े। ड्राइवर की पत्नी उसके घर रात को सोने के लिए आने वाली है। कमलेश्वर ने सिर्फ "ओह " कहा उसने एक गहरी सांस ली और दोनों ही सीढ़ियां उतरने लगे। कमलेश्वर ने कहा "कल मिलोगी ? अंजुरी ने उसकी ओर देखा और बोली ," हाँ ",वह तेजी से सीढ़ियां उतरती चली गई और अपनी दिशा की ओर मुड़ गई ,कमलेश्वर भी अपने घर की ओर चल दिया ---क्रमशः ----
मेरे बारे में---Nirupama Sinha { M,A.{Psychology}B.Ed.,Very fond of writing and sharing my thoughts
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