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सोमवार, 9 मार्च 2020

Dharavahik Upnyas ---Anhoni !! { 42 }

 रात को कमलेश्वर के कमरे में ही पापा चले आये थे ,शायद पहली बार आये थे।  कमलेश्वर सकपका गया था। वे कुर्सी खींच कर बैठ गए। कमलेश्वर उस समय खड़ा ही था। उन्होंने उसे बैठने को भी नहीं कहा। वे न सिर्फ गंभीर लग रहे थे बल्कि लग रहा था कि अपने क्रोध को बड़ी मुश्किल से दबाये हुए हैं। उन्होंने पूछा कौन कौन गया था ? चौहान सर ,आशा मैडम ,मैं और तहसीलदार साहब की बेटी। उनके चेहरे पर परेशानी के भाव बढे। कमलेश्वर जानता था कि उसकी बिरादरी की पर्दा प्रथा के पापा हिमायती हैं और वे लड़कियों की शिक्षा तो शायद स्वीकार भी कर लेते किन्तु खेलकूद ,सांस्कृतिक गतिविधियों को तो कतई स्वीकार ना करें। "उस लड़की के साथ ज्यादा घुला मिला मत करना "जी पापा "उसने कहा। " नाटक में भी वही थी ना ? जो कुटिल रानी बनी थी ?"जी"उसने सर झुकाये हुए कहा।  वे तेजी से कमरे के बाहर निकल गए। कमलेश्वर ने राहत की सांस ली। उसे यह अच्छा लगा कि उन्होंने यह नहीं पूछा कि क्या वो तुम्हारी क्लास में  पढ़ती है ? शायद वे उसे शहर भेज देते और हॉस्टल में रह कर पढ़ने को कहते। 
अगला दिन रविवार था।  अंजुरी ने सारा दिन अपनी मम्मी और पापा के साथ बिताया ,उसने छूटी हुई पढाई का सिरा थामने की कोशिश की। बीच बीच में उसके मानस पटल पर पिछले एक सप्ताह के क्षण उभर जाते थे ,कुछ प्रसन्नता से भरे ,और कुछ अत्यंत उदास थे। उसने अपनी अलमारी ठीक की ,कपड़ों को व्यवस्थित किया और जब सांझ हो गई तो कमरे में बैठ कर पढाई करने लगी। 
उधर कमलेश्वर ने सोचा कि उसे अंजुरी को अवगत कर देना चाहिए इस नए घटना क्रम के बारे में। उसने पत्र लिखना शुरू किया पहले "प्रिय अंजुरी " लिखा ,फिर उसे यह सम्बोधन औपचारिक सा लगा ,उसने लिखा "मेरी अंजू --उसे बहुत अच्छा लगा ,उसे गर्व हुआ ,उसने एक एक कर पापा की कही सारी बातें लिख दीं ,साथ ही उसने अपनी बिरादरी की पर्दा प्रथा और महिलाओं के बारे में कट्टरता का वर्णन भी कर दिया। सबकुछ लिख कर उसने पत्र को नोटबुक में रख कर सो गया। 

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