हलाहल-------
नैतिकता एक शब्द रह गया
जिसका कोई मोल नहीं,
बेईमानो की इस नगरी में,
इसका कोई तौल नहीं।
कह सकता है अब न कोई,
आत्म विश्वास से छाती ठोक ,
उसमे नहीं बुराई कोई,
पारदर्शी वह मय संतोख।
सत्यमेव जयते की उक्ति,
अधिकाधिक पराजित दिखती,
सज्जनता को मिलता दण्ड ,
झूठ से सबकी है अनुरक्ति।
झूठ ठठा कर हँसता दिखता,
सत्य सिसकता कोने बैठ
भ्रष्टाचारी और बेईमान,
चारों ओर उन्हीकी पैठ।
नैतिकता एक शब्द रह गया
जिसका कोई मोल नहीं,
बेईमानो की इस नगरी में,
इसका कोई तौल नहीं।
कह सकता है अब न कोई,
आत्म विश्वास से छाती ठोक ,
उसमे नहीं बुराई कोई,
पारदर्शी वह मय संतोख।
सत्यमेव जयते की उक्ति,
अधिकाधिक पराजित दिखती,
सज्जनता को मिलता दण्ड ,
झूठ से सबकी है अनुरक्ति।
झूठ ठठा कर हँसता दिखता,
सत्य सिसकता कोने बैठ
भ्रष्टाचारी और बेईमान,
चारों ओर उन्हीकी पैठ।
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