अनुकंपित--------------
क्यों सदा रहता है चिंतित,
क्यों सदा ही अव्यवस्थित,
आतुर क्यों सदैव ही रहता
होने को अवस्थित व्यवस्थित,
नहीं समझता यह भी किंचित,
समय है कितना अनपेक्षित,
सुख दुःखों की छांव भी,
ढूंढा करती निमित्त अनित्य,
कभी कभी वह यह विचारता,
क्या वह है जीवन से श्रापित,
नहीं!नहीं!वह है प्रभु प्यारा,
नहीं भूला प्रभु उसे तनिक,
जितना वह प्रभु को स्मरता,
प्रभु स्मरता है उससे अधिक,
झोली भरता रहता उसकी,
दया,क्षमा,सुख से नित नित!
शब्द अर्थ---अवस्थित--अवस्था में,किंचित--थोडा भी,
अनपेक्षित--जिसकी उम्मीद न हो,निमित्त--बहाना ,अनित्य--कभी कभी,अनुकंपित--कृपापात्र
क्यों सदा रहता है चिंतित,
क्यों सदा ही अव्यवस्थित,
आतुर क्यों सदैव ही रहता
होने को अवस्थित व्यवस्थित,
नहीं समझता यह भी किंचित,
समय है कितना अनपेक्षित,
सुख दुःखों की छांव भी,
ढूंढा करती निमित्त अनित्य,
कभी कभी वह यह विचारता,
क्या वह है जीवन से श्रापित,
नहीं!नहीं!वह है प्रभु प्यारा,
नहीं भूला प्रभु उसे तनिक,
जितना वह प्रभु को स्मरता,
प्रभु स्मरता है उससे अधिक,
झोली भरता रहता उसकी,
दया,क्षमा,सुख से नित नित!
शब्द अर्थ---अवस्थित--अवस्था में,किंचित--थोडा भी,
अनपेक्षित--जिसकी उम्मीद न हो,निमित्त--बहाना ,अनित्य--कभी कभी,अनुकंपित--कृपापात्र
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें