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रविवार, 8 मार्च 2020

Wajood Se : By Nirupama Sinha !!{48} Kaanta {49} Kabr !!

काँटा  --------

तमाम उम्र मैं रही जिनके साथ,
वो चेहरे तो जाने पहचाने थे,
पर एक दिन अचानक अनजाने से लगे,
जिनके लिए दिया मैंने अपना वक़्त ,अपनी मेहनत ,
उन्होंने निकाल फेंका अपनी जिंदगी से यूँ,
ज्यों निकाल फेंकता है कोई काँटा अपने पैर से,
और पलट कर देखता भी नहीं उसे,
तमाम उम्र मैं रही सफ़र में,बिना मंजिल तय किये,
सामने दिखते साहिल को छोड़ कर,
मोड़ देती रही अपना सफीना,
इन्ही जाने पहचाने लोगों की ओर ,
जो खुद तो खड़े थे साहिल पे,
लेकिन तमाम उम्र कोशिशें करते रहे लगातार,
डूब जाऊं मैं मँझधार।

शब्द-अर्थ---सफीना-नाव 

कब्र-----

बाद मरने के मेरे,कब्र पे आये तो क्या,
कब्र पे फूल चढ़ाये तो क्या,
फातिहा पढ़ा तो क्या,मर्सिया गया तो क्या,
जीते जी तो न की मेरी पहचान,
न दी तवज्जो दुनिया ने,
न मिली शोहरत न कोई नाम,
खो गया मेरे साथ ही,मेरा हुनर,
मेरे जज़बात, मेरे कलाम,
अब खाक में क्या ढूंढ़ रहे हो मेरे पैगाम,
जाओ जाकर दुनियादरी करो,ए दुनियावालों,
मेरे लिए न बर्बाद करो कीमती वक़्त अपना,
तुम्हे फुर्सत कहाँ,तुम्हे तो करने हैं कई काम,
मुझ जैसी शै तो पैदा होती है मर जाती है,
हाँसिल नहीं जो कर पाती जो दुनिया में कोई मकाम,
बीत जाते हैं लोग ऐसे ,बीते हुए वक़्त की तरह,
जीते हैं गुमनाम , और मर जाते हैं बेनाम!

शब्द अर्थ---शोहरत--ख्यति,कलाम--कविता,पैगाम--सन्देश,फातिहा--कब्र पर पढ़ी जाने वाली धार्मिक ग्रन्थ की पंक्तियाँ,मर्सिया--दुख भरा गीत,शै--छोटी शख्सियत,मकाम--निर्दिष्ठ ,बेनाम--जो विख्यात न हो 

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