राजेश दवे और उमेश साहू ने सेल्यूट किया। अनिरुद्ध चौधरी ने पूछा ,"कुछ कहने वाले थे ? जी सर ! टेकरी के पार वाले नीचे के जंगल के ऊपर बहुत सी चीलें उड़ रहीं हैं। शायद कोई जानवर मरा पड़ा हो। वहां बैठे पाँचों { कॉन्स्टेबल्स महेंद्र सक्सेना और दिवाकर वशिष्ठ भी वहीँ थे } व्यक्ति चौंक गए। अनिरुद्ध चौधरी तुरंत उठ खड़े हुए और साथ ही तहसीलदार अनमोल ठाकुर ,और उनकी पत्नी भी। दिवाकर वशिष्ठ भी साथ हो लिए ,उन्हेंअनिरुद्ध चौधरी ने ही उन्हें इशारा किया था।
इस बार दिवाकर वशिष्ठ ड्राइव कर रहे थे। टेकरी के उस ओर जंगल सा था। ज्यादा घना तो नहीं किन्तु पथरीला उजाड़ सा था। जंगली पशुओं की उपस्थिति कभी गई थी। उस तरफ की बस्ती {भेरू गढ़ } बहुत काम आबादी वाली बस्ती थी ,और निपट देहाती किसान,दूसरों के खेतों में मजदूरी करने वाले लोग वहां रहते थे। "घूम कर उस ओर से पहुँचने में लगभग आधा घंटा लगने वाला था। काफी दूर से ही आसमान में चीलों का कौओं का शोर सुनाई देने लगा और बड़ी संख्या में वे दिखाई भी देने लगे। दिवाकर वशिष्ठ ने जीप की स्पीड बढ़ा दी थी।
जब वह स्थान लगभग निकट आ गया दिवाकर वशिष्ठ ने जीप रोक दी। वहां कुछ स्थानीय लोग भी खड़े थे। चील कौए आसमान में ही मंडरा रहे थे। तहसीलदार साहब और ,उनकी पत्नी को जीप में ही बैठने को कह कर अनिरुद्ध चौधरी और दिवाकर वशिष्ठ उस और तेजी से बढे। कोई कपडा दृष्टिगत हो रहा था। दोनों लगभग भागते हुए उस स्थान तक जा पहुंचे। उन्होंने देखा कि अंजना ठाकुर तेजी से लगभग दौड़ती हुई सी उस स्थान तक आ पहुँची थीं और तहसीलदार साहब भी।
अंजना ठाकुर और भी आगे बढ़ गईं थीं ," वे लगभग गिर सी गईं "अंजू -----"वे दहाड़ मार कर जोर जोर से रोने लगीं ,अनिरुद्ध चौधरी ,ने उनसे आगे बढ़ कर देखा ,दिवाकर वशिष्ठ ने इशारे से बताया यह अंजुरी है ,तहसीलदार साहब भी निढाल से वहींबैठ गए। उनकी आँखों से आँसू बह रहे थे ,वे भी बड़बड़ा रहे थे किसने किया बेटा ? किसने तुम्हारी ये हालत कर दी है ? मैं छोडूंगा नहीं उसे। मेरी फूल जैसी बच्ची को किसने मारा है ? इंस्पेक्टर उसे जल्दी से जल्दी ढूंढिए।
बड़ी मुश्किल से समझा बुझाकर अनिरुद्ध चौधरी ने उन्हें वापस ले जाकर जीप में बैठाया कि ,उन्हें कानूनी खाना पूर्ती करनी होगी और बॉडी को हॉस्पिटल भी ले जाना होगा पोस्टमार्टम के लिए। यह बोलना उन्हें स्वयं ही अत्यंत क्रूर लग रहा था। अंजुरी का सुन्दर और अबोध सा चेहरा कितना प्रफुल्लित लगता होगा जीवितावस्था में और माता पिता को कितना प्रफुल्लित करता होगा ---क्रमशः ---
इस बार दिवाकर वशिष्ठ ड्राइव कर रहे थे। टेकरी के उस ओर जंगल सा था। ज्यादा घना तो नहीं किन्तु पथरीला उजाड़ सा था। जंगली पशुओं की उपस्थिति कभी गई थी। उस तरफ की बस्ती {भेरू गढ़ } बहुत काम आबादी वाली बस्ती थी ,और निपट देहाती किसान,दूसरों के खेतों में मजदूरी करने वाले लोग वहां रहते थे। "घूम कर उस ओर से पहुँचने में लगभग आधा घंटा लगने वाला था। काफी दूर से ही आसमान में चीलों का कौओं का शोर सुनाई देने लगा और बड़ी संख्या में वे दिखाई भी देने लगे। दिवाकर वशिष्ठ ने जीप की स्पीड बढ़ा दी थी।
जब वह स्थान लगभग निकट आ गया दिवाकर वशिष्ठ ने जीप रोक दी। वहां कुछ स्थानीय लोग भी खड़े थे। चील कौए आसमान में ही मंडरा रहे थे। तहसीलदार साहब और ,उनकी पत्नी को जीप में ही बैठने को कह कर अनिरुद्ध चौधरी और दिवाकर वशिष्ठ उस और तेजी से बढे। कोई कपडा दृष्टिगत हो रहा था। दोनों लगभग भागते हुए उस स्थान तक जा पहुंचे। उन्होंने देखा कि अंजना ठाकुर तेजी से लगभग दौड़ती हुई सी उस स्थान तक आ पहुँची थीं और तहसीलदार साहब भी।
अंजना ठाकुर और भी आगे बढ़ गईं थीं ," वे लगभग गिर सी गईं "अंजू -----"वे दहाड़ मार कर जोर जोर से रोने लगीं ,अनिरुद्ध चौधरी ,ने उनसे आगे बढ़ कर देखा ,दिवाकर वशिष्ठ ने इशारे से बताया यह अंजुरी है ,तहसीलदार साहब भी निढाल से वहींबैठ गए। उनकी आँखों से आँसू बह रहे थे ,वे भी बड़बड़ा रहे थे किसने किया बेटा ? किसने तुम्हारी ये हालत कर दी है ? मैं छोडूंगा नहीं उसे। मेरी फूल जैसी बच्ची को किसने मारा है ? इंस्पेक्टर उसे जल्दी से जल्दी ढूंढिए।
बड़ी मुश्किल से समझा बुझाकर अनिरुद्ध चौधरी ने उन्हें वापस ले जाकर जीप में बैठाया कि ,उन्हें कानूनी खाना पूर्ती करनी होगी और बॉडी को हॉस्पिटल भी ले जाना होगा पोस्टमार्टम के लिए। यह बोलना उन्हें स्वयं ही अत्यंत क्रूर लग रहा था। अंजुरी का सुन्दर और अबोध सा चेहरा कितना प्रफुल्लित लगता होगा जीवितावस्था में और माता पिता को कितना प्रफुल्लित करता होगा ---क्रमशः ---
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