इंस्पेक्टर अनिरुद्ध पहले तहसीलदार साहब और उनकी पत्नी को महाविद्यालय ले गए। उन्होंने उन्हें सांत्वना दी,यद्यपि उनका दुःख अपार था और वे दोनों ही निरंतर विलाप कर रहे थे। अनमोल ठाकुर बोले,"घर नहीं जा पाएंगे "हम अपनी बच्ची साथ ही रहेंगे,सभी कार्यवाहियां पूरी होने तक "वे दोनों अपनी जीप की ओर चले। उस समय तक पूरे रतनगढ़ में और महाविद्यालय तक में यह बात जंगल की आग की तरह फ़ैल चुकी थी। कमलेश्वर ने सुना प्रभा कह रही थी ," टेकरी के उस पार के जंगल में अंजुरी की मृत देह मिली है अभी अभी " सभी मित्र सन्न रह गए ,कमलेश्वर की आँखों के आगे अंधकार छा गया। उसे लगा जैसे उसके हृदय ने स्पंदन करना बंद कर दिया हो। न तो उसे प्रभा से कुछ और पूछने का साहस नहीं हुआ और ना ही वहां ठहरने का,उसे लग रहा था सभी की दृष्टि उसी पर टिकी हुई है और सभी की दृष्टि में वह अपराधी था। वह उठा और घर की तरफ जाने के लिए निकला। उसने देखा बाहर के प्रांगण में तहसीलदार साहब उनकी पत्नी अपनी जीप की ओर बढ़ रहे थे और इंस्पेक्टर अपनी जीप की ओर। इंस्पेक्टर ने उसे आते देखा और एक तीव्र दृष्टि उस पर डाली। कमलेश्वर ने दृष्टि साइकिल का लॉक खोलते हुए नीचे कर ली। जब उसने दृष्टि उठाई दोनों जीप बाहर की ओर निकल कर एक ही दिशा में जा रही थीं। बाहर आया और तेजी से साइकिल के पैड़ल मारते हुए घर पहुंचा।उसके पहुँचते ही रामू काका ने उसे कहा ,"फार्म पर हुजूर ने बुलाया है "और उसके उत्तर की प्रतीक्षा किये बिना ही वह निकल गए तब जैसे तैसे अपने कमरे में जाकर दरवाजे की सिटकनी चढ़ा दी। वह बिस्तर पर जा गिरा। आत्म ग्लानि ,घृणा ,दयनीयता ,अपार दुःख सभी भावनाएं एक साथ उसके मस्तिष्क पर हावी हो रहीं थीं। किन्तु दुःख ही सर्वाधिक था क्यूंकि वह फूट फूटकर रोने लगा। उसे लग रहा था अवश्य ही उसकी सगाई से अत्यधिक आहत होकर यह संसार छोड़ कर चली गई। ओह अंजू --मुझे क्षमा कर दो --मुझे क्षमा कर दो -बाहर अन्धकार हो चुका था ---और मन के भीतर और भी गहन अन्धकार छाया था ---क्रमशः --
मेरे बारे में---Nirupama Sinha { M,A.{Psychology}B.Ed.,Very fond of writing and sharing my thoughts
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