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गुरुवार, 2 अप्रैल 2020

Indore's glory !!


#लग्जरी_कारों_के_दीवाने_थे_श्रीमंत_यशवंत_राव_होलकर ||
इंदौर पर 217 साल तक राज करने वाले होलकर राजवंश के सबसे स्टाइलिश महाराज थे। इस मामले में उन्होंने अपने पिता तुकोजीराव होलकर को भी पीछे छोड़ दिया था।

तुकोजीराव के बेटे यशवंत राव न केवल कारों के शौकीन थे, बल्कि उन्हें ऑटोमोबाइल, कार के इंटीरियर और एक्सटीरियर की भी गहरी समझा थीं। महाराजा तुकोजीराव के पास अपने जमाने की सर्वश्रेष्ठ कारें हुआ करती थीं। वे खुद कार कंपनियों को निर्देश देकर अपनी पसंद की कारें डिजाइन करवाते थे। दुनिया में बनने वाली लगभग हर लग्जरी कार उनके गैरेज में जरूर होती थी। उन्हें दुनिया भर में प्रमुख कार संग्रहकर्ता के रुप में भी पहचान मिली हुई थी। होलकर राजघराने की कारों में एक और खूबी होती थी, वो यह कि इंदौर स्टेट का ध्वज रेडिएटर की बजाए विंड स्क्रीन के ऊपर लगाया जाता था।

गाडिय़ों के नंबर खास
होलकर राजवंश की गाडिय़ों के नंबर भी खास होते थे। यह नंबर थे एचएससी-1, एचएससी-2, एचएससी-3। यहां एचएससी का मतलब था होलकर स्टेट कार। तुकोजीराव के बेट यशवंत राव होलकर के बारे में कहा जाता है कि वे स्पोट्र्स कारों के शौकीन थे और उन्होंने देश विदेश में कई रिकॉर्ड बनाए थे। एक बार रतलाम से इंदौर के बीच का 150 किमी का सफर उन्होंने 60 मिनट में तय किया था।रास्ते में पडऩे वाले सभी गांवों के लोगों से कहा गया था कि वे सड़क पूरी तरह खाली रखें और म हाराजा की कार गुजरने के बाद ही सड़क पर आएं।

कारों का बेड़ा
महाराजा के पास महंगी कारों का विशाल बेड़ा था। इसमें मर्सिडीज से लेकर डुसेनबर्ग तक शामिल थीं। इनमें से अधिकतर कारें टू सीटर थीं। महाराजा की डुसेनबर्ग कार 265 हार्स पावर की थी और एल्युमिनियम एलॉय से बनी थी। महाराजा के बेड़े में फोर्ड कारों का हर मॉडल मौजूद था और इनकी संख्या 20 से अधिक थीं। उनके काफिले में कुल 60 से ज्यादा कारें थीं। इनमें मर्सिडीज, बैंटले, डेलैग डी-8 और रोल्स रॉयस जैसे नामी ब्रांड्स की कारें शामिल थीं। दुनिया के हर मोटर शो में महाराजा इंदौर जाते थे और अपनी पसंद की कार लाना नहीं भूलते थे। होलकर राजा रफ्तार के बेहद शौकीन थे। वे अक्सर रतलाम से इंदौर के बीच रफ्तार के नए रिकॉर्ड बनाया करते थे।
- एक बार उन्होंने 144 किलोमीटर की ये दूर महज 60 मिनट में पूरी की थी।

जब भी महाराजा की कार सरपट दौड़ती, लोग सड़क किनारे रुक जाते और उन्हें सलाम करते थे। कई बार जब कोई ड्रायवर गाड़ी लेकर निकलता तब भी लोग सलाम करने लगते थे।
◆ तुकोजीराव को यह बात नागवार गुजरी। ◆
उन्होंने कार कंपनियों को निर्देश दिया कि उनकी कारों में ऐसी बत्तियां लगाई जाएं जिससे वे जनता को बता सकें की गाड़ी कौन चला रहा है। इस तरह महाराजा तुकोजीराव के जमाने से कारों में लाल और नीली बत्तियां लगने का चलन शुरु हो गया। गाड़ी की लाल बत्ती जल रही है मतलब महाराजा गाड़ी चला रहे हैं। अगर नीली बत्ती जल रही है, तो इसका मतलब महारानी साहिबा चंद्रावती देवी ड्राइविंग सीट पर विराजमान हैं। अपने पति महाराजा तुकाेजीराव से जिद कर उन्होंने कार चलाना सीखा था। वे कई मौकों पर युवराज यशवंतराव और राजकुमारी को लेकर लांग ड्राइव पर जाया करती थीं।
- उस जमाने में महारानी  भारत की पहली महिला  कार चालक थी , उनकी ड्राइविंग देखने के लिए लोगों की खूब भीड़ उमड़ती थी। अगर दोनों बत्तियां बंद हैं तो इसका मतलब गाड़ी में महाराज और महारानी दोनों नहीं है।

यह व्यवस्था होलकर परिवार ने अपनी हर कार में शुरु करवाई। होलकर राजवंश की देखा-देखी दुनिया के अन्य हिस्सों में भी लोग अपनी कारों में अलग तरह की लाइट लगवाने लगें। इस हिसाब से कारों में विभिन्न रंगों की लाइट लगवाने का श्रेय होलकर राजवंश को देना अतिशयोक्ति नहीं होगा।

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