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बुधवार, 8 दिसंबर 2021

Dharm & Darshan !! Guru Govind Singh !!

  20 दिसम्बर से ले के 27 दिसम्बर तक।


इन्ही सात दिनों में गुरु गोबिंद सिंह जी का पूरा परिवार बलिदान  हो गया था ।
इधर हिन्दुस्तान Christmas के जश्न में डूबा एक दूसरे को बधाइयां देता है।
एक वह वक्त भी था जब पंजाब में ये सात दिन हर परिवार जमीन पर सोता था।

क्योंकि माता गूजरी ने ये रातें, दोनों छोटे बच्चो के साथ सरहिन्द के किले में , ठंडी बुर्ज में गुजारी थी -खाली फर्श पर।
जब वो नवाब वजीर खां की गिरफ्त में थीं।
यह सात दिन भारत के इतिहास में शोक का सप्ताह होता है,उत्सव का नही।

आज पंजाब समेत पूरा हिन्दुस्तान जश्न में डूब जाता है।

गुरु गोबिंद सिंह जी के बलिदान को इस अहसान फरामोश मुल्क ने सिर्फ 300 साल में भुला दिया। 
जो सभ्यता अपना इतिहास , अपने नायकों के बलिदान को भूल जाती हैं वो खुद विस्मृत इतिहास बन जाती है।
यह वक्त कोरल संगीत का नही..
बलिदानी गुरु के शोक और स्मृति में डूबने समय है।

*21 दिसंबर* 
श्री गुरु गोबिंद सिंह जी ने परिवार सहित श्री आनंद पुर साहिब का किला छोड़ा।

*22 दिसंबर:*

गुरु साहिब अपने दोनों बड़े पुत्रों सहित चमकौर के मैदान में पहुंचे और गुरु साहिब की माता और छोटे दोनों साहिबजादों को गंगू नामक ब्राह्मण जो कभी गुरु घर का रसोइया था उन्हें अपने साथ अपने घर ले आया।

चमकौर की जंग शुरू और दुश्मनों से जूझते हुए गुरु साहिब के बड़े साहिबजादे श्री अजीत सिंह उम्र महज 17 वर्ष और छोटे साहिबजादे श्री जुझार सिंह उम्र महज 14 वर्ष अपने 11 अन्य साथियों सहित मजहब और मुल्क की रक्षा के लिए वीरगति को प्राप्त हुए।

*23 दिसंबर*

गुरु साहिब की माता श्री गुजर कौर जी और दोनों छोटे साहिबजादे गंगू ब्राह्मण के द्वारा गहने एवं अन्य सामान चोरी करने के उपरांत तीनों को मुखबरी कर मोरिंडा के चौधरी गनी खान और मनी खान के हाथों ग्रिफ्तार करवा दिया गया और गुरु साहिब को अन्य साथियों की बात मानते हुए चमकौर छोड़ना पड़ा।

*24 दिसंबर*

तीनों को सरहिंद पहुंचाया गया और वहां ठंडे बुर्ज में नजरबंद किया गया।

*25 और 26 दिसंबर*

छोटे साहिबजादों को नवाब वजीर खान की अदालत में पेश किया गया और उन्हें धर्म परिवर्तन करने के लिए लालच दिया गया।

*27 दिसंबर*

साहिबजादा जोरावर सिंह और साहिबजादा फतेह सिंह को तमाम जुल्म ओ जब्र उपरांत जिंदा दीवार में चीनने उपरांत जिबह (गला रेत) कर शहीद किया गया और खबर सुनते ही माता गुजर कौर ने अपने साँस त्याग दिए।

अब निर्णय आप करो कि 
25 दिसंबर (क्रिसमस) को तवज्जो मिलनी चाहिए 
या क़ुरबानी की अनोखी और शायद दुनिया की इकलौती मिसाल को?

इस शहीदी सप्ताह से सभी को अवगत करवाने हेतु अधिकाधिक शेयर करें ताकि लोगों को सिख धर्म की बुनियाद का पता चल सके

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