एक गाँव में चार मित्र रहते थे...*
*चारों में इतनी घनी मित्रता थी कि हर समय साथ रहते उठते बैठते, योजनाएँ बनाते।*
*एक ब्राह्मण, एक ठाकुर, एक बनिया और एक नाई था।*
*पर कभी भी चारों में जाति का भाव नहीं था।*
*गज़ब की एकता थी।*
*इसी एकता के चलते वे गाँव के किसानों के खेत से गन्ने, चने आदि चीजे उखाड़ कर खाते थे।*
*एक दिन इन चारों ने किसी किसान के खेत से चने के झाड़ उखाड़े...*
*और खेत में ही बैठकर हरी हरी फलियों का स्वाद लेने लगे।*
*खेत का मालिक किसान आया...*
*चारों की दावत देखी।*
*उसे बहुत क्रोध आया।*
*उसका मन किया कि लट्ठ उठाकर चारों को पीटे।*
*पर चार के आगे एक ?*
*वो स्वयं पिट जाता।*
*सो उसने एक युक्ति सोची।*
*चारों के पास गया,*
*ब्राह्मण के पाँव छुए,*
*ठाकुर साहब की जयकार की*
*बनिया महाजन से राम जुहार*
*और फिर नाई से बोला--*
*देख भाई....*
*ब्राह्मण देवता धरती के देव हैं,*
*ठाकुर साहब तो सबके मालिक हैं अन्नदाता हैं,*
*महाजन सबको उधारी दिया करते हैं.....*
*ये तीनों तो श्रेष्ठ हैं*
*तो भाई इन तीनों ने चने उखाड़े सो उखाड़े पर तू ?*
*तू तो ठहरा नाई तूने चने क्यों उखाड़े ?*
*इतना कहकर उसने नाई के दो तीन लट्ठ रसीद किये।*
*बाकी तीनों ने कोई विरोध नहीं किया.....*
*क्योंकि उनकी तो प्रशंसा हो चुकी थी।*
*अब किसान बनिए के पास आया और बोला-*
*तू साहूकार होगा तो अपने घर का*
*पण्डित जी और ठाकुर साहब तो नहीं है ना!*
*तूने चने क्यों उखाड़े ?*
*बनिये के भी दो तीन तगड़े तगड़े लट्ठ जमाए।*
*पण्डित और ठाकुर ने कुछ नहीं कहा।*
*अब किसान ने ठाकुर से कहा--*
*ठाकुर साहब....*
*माना आप अन्नदाता हो...*
*पर किसी का अन्न छीनना तो ग़लत बात है....*
*अरे पण्डित महाराज की बात दीगर है*
*उनके हिस्से जो भी चला जाये दान पुन्य हो जाता है.....*
*पर आपने तो बटमारी की!*
*ठाकुर साहब को भी लट्ठ का प्रसाद दिया,*
*पण्डित जी कुछ बोले नहीं,*
*नाई और बनिया अभी तक अपनी चोट सहला रहे थे।*
*जब ये तीनों पिट चुके....*
*तब किसान पण्डितजी के पास गया और बोला--*
*माना आप भूदेव हैं,*
*पर इन तीनों के गुरु घण्टाल आप ही हैं*
*आपको छोड़ दूँ*
*ये तो अन्याय होगा*
*तो दो लट्ठ आपके भी पड़ने चाहिए।*
*मार खा चुके बाकी तीनों बोले.....*
*हाँ हाँ, पण्डित जी को भी दण्ड मिलना चाहिए।*
*अब क्या पण्डित जी भी पीटे गए।*
*किसान ने इस तरह चारों को अलग अलग करके पीटा....*
*किसी ने किसी के पक्ष में कुछ नहीं कहा,*
*उसके बाद से चारों कभी भी एक साथ नहीं देखे गये।*
*मित्रों पिछली दो तीन सदियों से हिंदुओं के साथ यही होता आया है,*
*कहानी सच्ची लगी हो तो समझने का प्रयास करो और..*
*अगर कहानी केवल कहानी लगी हो..*
*तो आने वाले समय के लट्ठ तैयार हैं।*
*विचार कीजिएगा।
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