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गुरुवार, 24 फ़रवरी 2022

Dharm & Darshan !! Ekta Ka Bal !!

 

एक गाँव में चार मित्र रहते थे...*

 

 

 

*चारों में इतनी घनी मित्रता थी कि हर समय साथ रहते उठते बैठते, योजनाएँ बनाते।*

 

*एक ब्राह्मण, एक ठाकुर, एक बनिया और एक नाई था।*

 

*पर कभी भी चारों में जाति का भाव नहीं था।*

 

*गज़ब की एकता थी।*

 

*इसी एकता के चलते वे गाँव के किसानों के खेत से गन्ने, चने आदि चीजे उखाड़ कर खाते थे।*

 

*एक दिन इन चारों ने किसी किसान के खेत से चने के झाड़ उखाड़े...*

 

*और खेत में ही बैठकर हरी हरी फलियों का स्वाद लेने लगे।*

 

*खेत का मालिक किसान आया...* 

 

*चारों की दावत देखी।*

 

*उसे बहुत क्रोध आया।*

 

*उसका मन किया कि लट्ठ उठाकर चारों को पीटे।

 

*पर चार के आगे एक ?*

 

*वो स्वयं पिट जाता।*

 

*सो उसने एक युक्ति सोची।*

 

*चारों के पास गया,*

 

*ब्राह्मण के पाँव छुए,*

 

*ठाकुर साहब की जयकार की*

 

*बनिया महाजन से राम जुहार

 

*और फिर नाई से बोला--*

 

*देख भाई....* 

 

*ब्राह्मण देवता धरती के देव हैं,*

 

*ठाकुर साहब तो सबके मालिक हैं अन्नदाता हैं,*

 

*महाजन सबको उधारी दिया करते हैं.....*

 

*ये तीनों तो श्रेष्ठ हैं*

 

*तो भाई इन तीनों ने चने उखाड़े सो उखाड़े पर तू ?*

 

*तू तो ठहरा नाई तूने चने क्यों उखाड़े ?*

 

*इतना कहकर उसने नाई के दो तीन लट्ठ रसीद किये।*

 

*बाकी तीनों ने कोई विरोध नहीं किया.....*

 

*क्योंकि उनकी तो प्रशंसा हो चुकी थी।*

 

*अब किसान बनिए के पास आया और बोला-*

 

*तू साहूकार होगा तो अपने घर का*

 

*पण्डित जी और ठाकुर साहब तो नहीं है ना!*

 

*तूने चने क्यों उखाड़े ?*

 

*बनिये के भी दो तीन तगड़े तगड़े लट्ठ जमाए।*

 

*पण्डित और ठाकुर ने कुछ नहीं कहा।*

 

*अब किसान ने ठाकुर से कहा--*

 

*ठाकुर साहब....*

 

*माना आप अन्नदाता हो...*

 

*पर किसी का अन्न छीनना तो ग़लत बात है....*

 

*अरे पण्डित महाराज की बात दीगर है*

 

*उनके हिस्से जो भी चला जाये दान पुन्य हो जाता है.....*

 

*पर आपने तो बटमारी की!*

 

*ठाकुर साहब को भी लट्ठ का प्रसाद दिया,*

 

*पण्डित जी कुछ बोले नहीं,*

 

*नाई और बनिया अभी तक अपनी चोट सहला रहे थे।*

 

*जब ये तीनों पिट चुके....*

 

*तब किसान पण्डितजी के पास गया और बोला--*

 

*माना आप भूदेव हैं,*

 

*पर इन तीनों के गुरु घण्टाल आप ही हैं*

 

*आपको छोड़ दूँ*

 

*ये तो अन्याय होगा*

 

*तो दो लट्ठ आपके भी पड़ने चाहिए।*

 

*मार खा चुके बाकी तीनों बोले.....*

 

*हाँ हाँ, पण्डित जी को भी दण्ड मिलना चाहिए।*

 

*अब क्या पण्डित जी भी पीटे गए।*

 

*किसान ने इस तरह चारों को अलग अलग करके पीटा....*

 

*किसी ने किसी के पक्ष में कुछ नहीं कहा,*

 

*उसके बाद से चारों कभी भी एक साथ नहीं देखे गये।

 

*मित्रों पिछली दो तीन सदियों से हिंदुओं के साथ यही होता आया है,*

 

*कहानी सच्ची लगी हो तो समझने का प्रयास करो और..*

 

*अगर कहानी केवल कहानी लगी हो..*

 

*तो आने वाले समय के लट्ठ तैयार हैं।*

 

*विचार कीजिएगा।

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