*मध्यप्रदेश की आईएएस बिरादरी में हर दौर में कुछ साहित्यकार विद्यमान रहे हैं। आदरणीय नरोन्हा साब से शुरू हुई यह परंपरा श्री अशोक वाजपेई, श्री ओपी रावत, श्री मनोज श्रीवास्तव जी से होती हुई वर्तमान में श्री नियाज़ अहमद खान के रूप में विद्यमान हैं।*
*श्री नियाज़ अहमद खान के सातवें उपन्यास-Be ready to die-का अभी 19 फरवरी 2022 को विमोचन हुआ है।इस उपन्यास में श्री खान ने एक अछूता और सम्पूर्ण हिंदू समाज को झकझोर देने वाला विषय उठाया है। भले ही,इसे उपन्यास के फार्मेट में लिखा गया है लेकिन वस्तुत: यह एक दस्तावेज की शक्ल अख्तियार कर लेता है। पुरातनकाल में हिंदू संस्कृति पूरे विश्व में छायी हुई थी। यह उपन्यास इस तथ्य का एक और पुख्ता प्रमाण प्रस्तुत करता है। आज, बहुत कम हिंदुओं को यह जानकारी होगी कि उत्तरी इराक की पहाड़ियों के बीच हिंदुओं की एक भूली-बिसरी शाखा आज भी आबाद है और शताब्दियों से भयंकर अत्याचार सहकर भी अपने धर्म पर अडिग है। इराक़,तुर्की, सीरिया, आर्मेनिया जैसे कट्टर इस्लामिक देशों के बीचों-बीच एक अल्पसंख्यक क़ौम रहती है जो यजीदी कहलाते हैं। नाम से ऐसा लगता है कि यह क़ौम यहूदी अथवा इस्लाम धर्म की कोई शाखा होगी। परंतु, यह हिंदू अथवा सनातन धर्म का बचाखुचा अवशेष है जो उस क्षेत्र में हिंदू धर्म की प्राचीन उपस्थिति की गवाही देती है। चारों तरफ कट्टर इस्लामी शक्तियों से घिरी होने के कारण यह क़ौम हमेशा उनके निशाने पर रहती है।चारों तरफ मौजूद इस्लामी कट्टरवादियों को यह नागवार गुजरता है कि उनकी नाक के नीचे कोई समुदाय मूर्ति पूजा करें। संध्या आरती करें।जी हां यजीदी लोगों के बिल्कुल हिंदू मंदिरों जैसे शिखरयुक्त मंदिर होते हैं।उन मंदिरों में ये लोग मोर की मूर्ति की पूजा करते हैं। सुबह शाम आरती होती है जिसे ये लोग सजाक्स कहते हैं जो संध्याकर्म या संध्यापूजन का अपभ्रंश प्रतीत होता है। यजीदी पुरूष दोनों भौंहों के बीच तिलक लगाते हैं। यजीदी महिलाएं बिंदी लगाती हैं। शोधकर्ताओं का मत है कि यजीदी यजुर्वेदीय से निकला है। ये अपने धर्म को यजदान कहते हैं जो यज्ञदान, यजमान की बिरादरी का शब्द है।हमारी कथाएं कहती हैं कि सप्त ऋषियों में से एक अत्रि ऋषि सिंधु नदी पार कर गये थे और वहां उन्होंने यज्ञ पद्धति का प्रचार प्रसार किया था। ईरान जो पहले आर्यान था, में अग्निपूजक पारसी लोग अत्रि ऋषि की परंपरा के लोग माने जा सकते हैं।इसी तरह ईरान से लगे हुए ईराक में मूर्तिपूजक यजीदियों की उपस्थिति अत्रि ऋषि की परंपरा के भग्नावशेष प्रतीत होते हैं। यजीदी अपने भगवान को इजदीस कहते हैं जो जगदीश से साम्य रखता है। उनकी मान्यता है कि इजदीस ने सृष्टि का निर्माण कर सात देवदूतों को उसकी जिम्मेदारी सौंप दी है। उनकी यह मान्यता सप्त ऋषियों की हमारी मान्यता से मिलती है।मोर पर सवार देवदूत उनका प्रधान देवता है जिसकी मूर्ति मंदिर में स्थापित रहती है। मंदिर के बाहरी दीवार पर नाग मूर्ति स्थापित रहती है। उल्लेखनीय बात यह है है कि इराक़, ईरान और उस सम्पूर्ण भू-भाग में कहीं भी दूर दूर तक मोर नहीं पाया जाता है।यजीदियों का विश्वास है कि उनका ईश्वर तीन शक्तियों में विभाजित होकर सृष्टि को संचालित करता है है। यह विश्वास ब्रह्मा, विष्ण, महेश की त्रयी का रुपांतरण है। सामाजिक जीवन में भी उनके रीति रिवाज हिंदुओं जैसे ही हैं। बच्चों का मुंडन होता है। विवाह में दुल्हन लाल जोड़ा पहनती है।उनके पुजारियों पर भी देवताओं की सवारी आती है और उस अवस्था में पीड़ित लोगों की समस्याओं के हल बताते हैं। मंदिर में जाने के पहले पवित्र नदी में स्नान करते हैं। दीपावली से मिलता जुलता त्यौहार मनाते हैं जिसमें बहुत सारे दीपक प्रज्वलित किये जाते हैं। निराहार व्रत रखते हैं।सिंजर पहाड़ को वे पवित्र मानते हैं और उसे अपना संरक्षक कहते हैं।वे अपने धर्म को विश्व का सबसे प्राचीन धर्म मानते हैं।वे पुनर्जन्म और आत्मा को मानते हैं।आत्मा के एक शरीर से दूसरे शरीर में आवागमन पर उनका दृढ़ विश्वास है। पवित्र जीवन जीने पर आत्मा मोक्ष को प्राप्त होती है- यह भी उनके आधारभूत विश्वासों में शामिल है। यजीदी किसी भी कीमत पर अपना धर्म छोड़ने तैयार नहीं होता क्योंकि उनका अटूट विश्वास है कि धर्म छोड़ देने पर वे मोक्ष से वंचित हो जायेंगे।*
*यजीदियों की गैर इस्लामिक धार्मिक मान्यताएं उनके लिए प्राणघातक सिद्ध होती रही हैं।यजीदी इतिहास बताता है कि इनका 72 बार नरसंहार किया जा चुका है।इनके पुरुषों को मौत के घाट उतार दिया जाता है और इनकी महिलाओं का अपहरण कर सेक्स वर्कर बना लिया जाता है।उनके साथ गैंगरेप होते हैं। उन्हें बाजारों में बेंच दिया जाता है। अभी ताजा नरसंहार वर्ष 2014 में आतंकी संगठन आईएस आईएस द्वारा किया गया था जिसमें 15000 यजीदियों की हत्या कर दी गई थी और लगभग 5000 यजीदी महिलाओं को उठा लिया गया था। अपहृत की गई महिलाओं को आईएस लड़ाके अपने कैंपों में ले गये और उनके साथ महीनों तक सामूहिक बलात्कार होता रहा। बूढ़ी औरतों को मार डाला गया और युवतियों को बेंच दिया गया था। उन्हीं अपहृत और बलत्कृत महिलाओं में एक युवती नादिया मुराद भी थी जो सौभाग्यवश कुछ अन्य युवतियों के साथ संयुक्त राष्ट्र के हस्तक्षेप से बाद में छुड़ा ली गई थी।उसी ने संयुक्त राष्ट्र संघ और समूची दुनिया को उनके साथ हुए अमानुषिक कृत्यों की जानकारी दी और यजीदियों के साथ हो रहे अत्याचारों के प्रति जागरूकता अभियान चलाया।उसे वर्ष 2018 में नोबेल शांति पुरस्कार से सम्मानित किया गया। शताब्दियों से चल रहे निरंतर नरसंहार के कारण यजीदी समुदाय की जनसंख्या अपुष्ट अनुमान के अनुसार केवल पांच लाख बची है। यजीदी समुदाय को शिकायत है कि पूरे विश्व ने उन्हें उनके हाल पर छोड़ दिया है और उनकी मदद कोई नहीं करता।*
*एक मुस्लिम धर्मावलंबी आईएएस अफसर श्री नियाज़ अहमद खान जी ने अपनी किताब के माध्यम से यह विषय उठाकर श्रेष्ठ मानवीय संवेदना का परिचय दिया है। हिंदू पुनर्जागरण के वर्तमान दौर में भारत के हिंदू समाज से अपने इन भूले-बिसरे भाइयों की तरफ भी ध्यान देने की अपेक्षा करना मुझे समीचीन प्रतीत होता है।हम समूचे विश्व में भारतीय संस्कृति का प्रचार प्रसार करने के लिए संकल्पित हैं तो अत्रि ऋषि की परंपरा के अनुयायी इन यजीदी या यजुर्वेदीय लोगों को हमारा समर्थन मिलना ही चाहिए जिन्होंने 72 बार नरसंहार और सामूहिक बलात्कार झेलकर भी अपनी वैदिक मान्यताओं का परित्याग नहीं किया है। सुंदर कांड की चौपाई-पवनपुत्र अस दशा हमारी,जिमि दसनन्हिं महिं जीभ बिचारी-बिलकुल सटीक बैठती है।*
*हम अपने इन भाई-बहनों के लिए इतना तो कर ही सकते हैं कि एक पत्र या ईमेल राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, राज्यपाल, मुख्यमंत्री को लिखकर यजीदी समुदाय के संरक्षण हेतु यथोचित उपाय सुनिश्चित करने का अनुरोध करें। सोशल मीडिया पर इनके बारे में लिखें।ट्वीट करें। अखबारों में लिखें।*
*हम शीघ्र ही भोपाल में इस विषय पर समाज के प्रबुद्ध जनों की एक विचार-गोष्ठी आयोजित करने का विचार कर रहे हैं।*
*सुधीर नायक*
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