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रविवार, 13 अक्टूबर 2024

Dharm & Darshan ! Mukti ka marg ! Rajendra ki kalam se !!

 गरुड़ पुराण के अनुसार मुक्ति के चार रास्ते हैं -

ब्रह्म ज्ञान, गया श्राद्ध, कुरुक्षेत्र निवास(गीता), और गौशाला में देहत्याग! 

इनमें से गया श्राद्ध को मोक्ष तीर्थ कहा गया है क्योंकि यहां मृत्यु पश्चात भी मोक्ष के लिए अनुष्ठान होते हैं।

ब्रह्मा जी ने सृष्टि के प्रारंभिक काल में त्रिपुरा असुर की भी सृष्टि की थी जो अनन्य विष्णु भक्त हुआ। विष्णु का एक नाम "गय" भी है अतः उसने अपने पुत्र का नाम रखा गया यानी गया असुर!वह भी विष्णु भक्त था।

असुरों को हेय दृष्टि से देखा जाता था अतः इस स्तर से मुक्ति के लिए उसने कोलाहाला (आधुनिक कश्मीर) के पहाड़ों पर स्वांस को रोक कर वर्षों तपस्या करता रहा। इसके इस तपस्या से इंद्र घबरा गये और देवताओं के संग विष्णु के पास गए और गयासुर के तपस्या को भंग करने की विनती करने लगे।

विष्णु ने उसके तपस्या को भंग करने के लिए उसे तत्काल वरदान देने का विचार किया।

गयासुर ने वरदान मांगा कि उसके शरीर को इतना पवित्र कर दिया जाय की,जो कोई भी उसे स्पर्श करें, देखें, उसे उसी क्षण मोक्ष मिल जाए। विष्णु ने यह वरदान उसे दे दिया।

इसके बाद गया सुर को देखने और स्पर्श करने वालों का तांता लग गया। यहां तक की अधर्मी और अत्याचारी भी आकर मोक्ष प्राप्त करने लगे।

इससे संसार की सारी व्यवस्था तहस-नहस होने लगी।तब ब्रह्मा विचार करके गया सुर के पास गए और बोले कि मैं सभी देवताओ के साथ एक यज्ञ करना चाहता हूं जिसके लिए हमें एक पवित्र स्थान चाहिए। तुम्हारे शरीर के अतिरिक्त मुझे लोक में कोई दुसरा स्थान नहीं दीख रहा है।

गया सुर ने इस हेतु अत्यंत खुशी से अपने शरीर का दान ब्रह्मा जी को कर दिया और उत्तर के तरफ सिर करके लेट गया।(आज भी मरणासन्न या मृत प्राणी को या चिता पर  शीघ्र मुक्ति के लिए उत्तर के तरफ सिर करके सुलाया जाता है)

देवताओं ने उसके शरीर पर यज्ञ आरम्भ कर दिया जो पन्द्रह दिनों तक चला। यज्ञ के दौरान कुंड के ताप से गया सुर का शरीर हिलने लगा तब विष्णु ने उसके शरीर को पैरों से दबा कर शांत किया इस पदचिन्ह पर आज श्राद्ध होते हैं! इसे ही विष्णु पद कहते हैं जिस पर मंदिर बना है। आधुनिक काल में जिसका जिर्णोद्धार महारानी अहिल्याबाई होलकर ने की।

देवताओं ने प्रसन्न होकर वर मांगने को कहा तब गया सुर ने मांगा कि आप सभी देव, त्रिदेवों के संग अनंत काल तक यही वास करें और जब भी जो कोई श्रद्धा भाव से यहां पूजन करें उसके पितरों के संग संग उसे भी मोक्ष की प्राप्ति हो! यह स्थान मेरे नाम से विख्यात हो।

आज भी गया तीर्थ में उसी पंद्रह दिनों में फल्गु नदी के तट पर अक्षयवट के नीचे विष्णु पद मंदिर में पितरों के मोक्ष के लिए 

लोग आते हैं जो पितृपक्ष मेला के नाम से विख्यात है।

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