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मंगलवार, 17 दिसंबर 2024

Vriddhon me chhupa bachpan !!

 “वृद्घों में छुपा बचपन “

जो आपको दिखते हैं बूढ़े से लाचार से ,

आँखों पर ऐनक चढ़ाए या हाथ में लाठी लिए 

बीमार से 

उन्हें कम न समझना 

क्यूँकि

वे ही हैं तुम्हारी नैया की पतवार से 

जीया है उन्होंने उछलता कूदता , गलियों में या स्कूल के मैदानों में भागता दौड़ता बचपन , 

वे हैं अपने जमाने के ख़ुशियों से लबरेज़ बड़े से बड़े 

ताल से 

वे जिये माता पिता के लिए ,भाई बहन के लिए ,

पति पुत्र और ससुराल के बीच , परिवार से ,

दम है आज भी आत्मविश्वास का उनमें ,

आज भी हल कर देते हैं चुटकियों में समस्या 

अनुभव के संस्कार से 

अपमान न करना कभी इनका 

ये वो बेशक़ीमती हीरे हैं 

खो गए तो नहीं मिलेंगे कभी संसार में ! 

कवियत्री : निरुपमा सिन्हा

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