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रविवार, 30 मार्च 2025

Dharm & Darshan !! Vikram Samvat !!

 *सृष्टि के पहले दिन से काल की गणना, चंद्र और सूर्य ग्रहण की अग्रिम जानकारी: दुनिया के सबसे प्राचीन और सटीक कैलेंडर ‘विक्रम संवत’ का वर्ष 2082 शुरू, जानिए किसने और कब की थी शुरुआत*


चैत्र शुक्ल प्रतिपदा के साथ ही आज रविवार (30 मार्च 2025) को हिंदू नव वर्ष 2082 की शुरुआत हो गई। इसे नव संवत्सर या विक्रम संवत भी कहा जाता है। कहा जाता है सम्राट विक्रमादित्य के नवरत्नों में से एक महान खगोलविद वाराह मिहिर ने इस कैलेंडर की शुरुआत की थी और उसका नाम विक्रम संवत या विक्रमी संवत रखा था। माना जाता है कि ब्रह्मा ने इसी दिन सृष्टि की रचना की थी। यानी चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को सृष्टि उत्पन्न हुई थी।


देश-दुनिया भले ही पोप ग्रेगरी द्वारा विकसित ग्रेगोरियन कैलेंडर प्रचलित हो, लेकिन विक्रम संवत आज भी भारतीय और नेपाल मूल के लोगों के जीवन का अंग है। नेपाल ने विक्रम संवत वाला हिंदू कैलेंडर ही लागू है। वहीं, भारत सहित दुनिया भर के हिंदू शादी-विवाह से लेकर अन्य शुभ मुहूर्त एवं पर्व-त्यौहार इसी कैलेंडर पर आधारित कालगणना से तय करते हैं। विक्रम संवत दुनिया का सबसे वैज्ञानिक एवं सटीक कालगणना है।


*जानकारों का कहना है कि विक्रम संवत सूर्य की और चंद्र की गति, दोनों की गति पर आधारित है। दुनिया का ये अकेला कैलेंडर है, जो गणना करके सूर्य ग्रहण या चंद्र का पहले ही घोषणा कर देता है कि इस दिन को इतने बजे सूर्य या चंद्र ग्रहण लगेगा। इस कैलेंडर के जरिए किसी भी खगोलीय स्थिति की गणना वर्षों पहले लगाई जा सकती है। इस तरह की खगोलीय जानकारी पश्चिमी कैलेंडरों से नहीं मिलती है।*


सम्राट विक्रमादित्य के नवरत्नों में शामिल आचार्य वाराह मिहिर ने पृथ्वी द्वारा सूर्य के चक्कर लगाने की एकदम सटीक गणना की है। उसी गणना के आधार पर उन्होंने दिन और रात के समय का निर्धारण किया है। इसमें पल, प्रतिपल, घटी, मुहूर्त और पहर होते हैं। इन्हीं के आधार पर तिथियों का निर्धारण एवं उनकी गणना की जाती है। इतना ही नहीं, यह कैलेंडर साल में आने वाले विभिन्न ऋतुओं के अलावा नक्षत्रों के बारे में भी बताता है।


*अति प्राचीन ग्रंथ ‘सूर्य सिद्धांत’ में कहा गया है कि पृथ्वी सूर्य का चक्कर लगाने में 365 दिन 15 घटी 31 पल तथा 24 प्रतिपल लगाती है। विक्रम संवत में 12 मास होते हैं और मास सिर्फ 30 दिन का होता है। यह मास 15 दिन के दो पक्ष में बँटा होता है, जो शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष का होता है। विक्रम संवत में हर तीन साल पर एक मास बढ़ जाता है, जिसे अधिमास या मलमास कहा जाता है।*


*दरअसल, मासों की गणना या निर्माण पृथ्वी की अपनी कक्षा से नहीं की गई, इसका निर्धारण चंद्रमा के पृथ्वी के चारों ओर की कक्षा से किया गया। इसलिए इसे चंद्र मास भी कहते हैं। चंद्रमा का एक मास 30 चंद्र तिथियों का होता है, परंतु वह सौर मास (सूर्य मास) से लगभग आधा दिन छोटा होता है। दोनों मासों में सामंजस्य बैठाने के लिए भारतीय ज्योतिषाचार्यों ने मलमास या अधिमास का विधान किया।* 


यह अधिमास या मलमास इसलिए होता है, ताकि सूर्य वर्ष से एकरूपता लाई जा सके। इसी के कारण हिंदू महीनों, वर्ष, ऋतुओं एवं खगोलीय गणना में सटीकता रहती है। विक्रम संवत से ऋतु परिवर्तन की सटीक जानकारी, नक्षत्रों की स्थिति, ग्रहों की स्थिति, सूर्य या चंद्र ग्रहण का काल, तिथि और मुहूर्त की गणना सटीक होती है। वहीं, यूरोप में पहले एक साल 360 दिन का हुआ करता था।


विक्रम संवत का जिक्र ब्रह्म पुराण में भी है। इसमें कहा गया है कि चैत्र शुक्ल प्रतिपदा ब्रह्मा का पहला दिन है और सृष्टि के कालचक्र का भी पहला दिन है। विक्रम संवत की शुरुआत इसी चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से होती है। ग्रेगोरियन कैलेंडर की शुरुआत ईसा मसीह के जन्म से होती है। इसे ईसाई कैलेंडर भी कहा जाता है। ग्रेगोरियन कैलेंडर विक्रम संवत से 57 साल पीछे चल रहा है। ग्रेगोरियन कैलेंडर के अनुसार अभी साल 2025 चल रहा है, विक्रम संवत के अनुसार यह 2082 चल रहा है।


हिंदू ग्रंंथों कहा गया है कि उज्जैन के सम्राट विक्रमादित्य ने शकों पर इसी दिन जीत हासिल की थी।


*ये वही सम्राट विक्रमादित्य हैं, जिनके दरबार में आयुर्वेद के जनक धन्वंतरि, जैन संन्यासी एवं नीति शास्त्र के ज्ञाता क्षपणक, बौद्ध ज्ञाता अमर सिंह, विद्वान कवि शंकु, कवि घटखर्पर, राजकवि कालिदास, तंत्र शास्त्र के ज्ञानी वेताल भट्ट, व्याकरण के आचार्य वररुचि, खगोलशास्त्री वाराह मिहिर शामिल थे। इनमें अमर सिंह और वाराह मिहिर का जन्म क्षत्रिय कुल में हुआ था, जबकि कालिदास और वेताल भट्ट ब्राह्मण कुल के थे। बाकी वैश्य एवं आज दलित कहे जाने वाले समुदाय से भी थे।*


कहा जाता है कि विक्रम संवत से पहले युधिष्ठिर संवत, कलियुग संवत, सप्तर्षि संवत आदि प्रचलन में आए थे। माना जाता है कि सभी संवत की शुरुआत चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से होती ही थी, लेकिन अन्य बातें स्पष्ट नहीं थीं। इसके बाद विक्रम संवत अस्तित्व में आया और इसमें तिथि से लेकर तिथि, मास, संवत्सर (यानी वर्ष), नक्षत्र आदि की स्पष्टता थी।

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