बनारस के गलियों में इस बार उतरे फ्रांस के सबसे बड़े 'फूड क्रिटिक' (भोजन समीक्षक) मिस्टर जूलियन, जो दुनिया भर के 5-स्टार होटलों को अपनी रेटिंग देते थे। जूलियन साहब का मानना था कि 'मोक्ष' केवल एक दार्शनिक शब्द है, जिसका स्वाद से कोई लेना-देना नहीं। वे अपने साथ चांदी का चम्मच और एक 'फ्लेवर एनालाइजर' लेकर आए थे।
उनका मिशन था— बनारस के खाने में 'मोक्ष' के दावे की पोल खोलना।
जैसे ही जूलियन साहब गोदौलिया की एक दुकान पर खड़े हुए, उन्होंने देखा कि हलवाई बिना किसी 'ग्लव्स' के, पसीने से तर-बतर होकर कचौड़ी तल रहा था। जूलियन ने अपनी नाक सिकोड़ी और कहा— This is unhygienic! Where is the soul in this oil?
दुकानदार ने मुस्कुराकर उन्हें एक पत्तल पर गरमा-गरम हींग वाली सब्जी और कचौड़ी थमा दी। जूलियन ने जैसे ही पहला निवाला लिया, उनके कान के पीछे से गर्मी निकलने लगी। उन्होंने अपना चांदी का चम्मच जेब में रख लिया और हाथ से सब्जी चाटने लगे।
उन्होंने डायरी में लिखा— रिसर्च नोट: पेरिस में हम पेट भरने के लिए खाते हैं, बनारस में कचौड़ी का पहला निवाला ही 'अहंकार' का विसर्जन कर देता है। तीखी सब्जी ने मेरे अंदर के सारे 'लॉजिक' जला दिए—यही तो शुद्धिकरण है!
दोपहर को जूलियन साहब 'टमाटर चाट' की दुकान पर पहुँचे। उन्होंने देखा कि चाट के ऊपर देसी घी की नदियाँ बह रही हैं। जूलियन ने अपना 'कैलोरी काउंटर' निकाला, लेकिन दुकानदार ने चाट का दोना उनके हाथ में थमाते हुए कहा— साहेब, कैलोरी गिनोगे तो 'कोशिश' करोगे, चाट खाओगे तो सीधे 'ईश्वर' से मिलोगे।
चाट मुँह में जाते ही जूलियन को लगा कि उनके जीभ पर हज़ारों सितारे एक साथ नाच रहे हैं। उन्होंने अपनी 'मिचेलिन स्टार' वाली रेटिंग फाइल गंगा में फेंक दी और लिखा— "डिस्कवरी: मोक्ष कोई जगह नहीं है, मोक्ष तो उस 'टमाटर चाट' के आखिरी घूँट में है जो घी और खटास के साथ गले से नीचे उतरता है।
असली 'निर्वाण' तब मिला जब जूलियन ने 'मलइयो' चखा। उन्होंने उसे हवा में उछालकर देखा और चकित रह गए। उन्होंने नोट किया— "साइंटिफिक अपडेट: यह मिठाई नहीं, यह तो 'ठोस अवस्था में अध्यात्म' (Solid Spirituality) है। इसे खाते ही महसूस होता है कि इंसान का शरीर मिट्टी है, लेकिन उसकी भूख दिव्य है।
शाम को जूलियन साहब एक पान की दुकान पर खड़े थे। दुकानदार ने उन्हें 'बनारसी किमाम' वाला पान खिलाया। पान मुँह में दबाते ही जूलियन की आँखें बंद हो गईं। अब वो न बोल सकते थे, न सोच सकते थे—वह पूरी तरह 'शून्य' में थे।
उन्होंने पेरिस के अपने हेड-ऑफिस को ईमेल भेजा:
"प्रोजेक्ट खत्म! मैं वापस नहीं आ रहा। मैंने सालों तक दुनिया के सबसे महंगे शेफ के हाथ का खाना खाया, पर असली 'मोक्ष' तो बनारस की गलियों के इन जली हुई कड़ाहियों और पत्तलों में छिपा है। यहाँ पेट नहीं भरता, यहाँ 'आत्मा' डकार लेती है।
आखरी नोट:
फ्रांस में हमारे पास 'आर्ट ऑफ कुकिंग' है, पर बनारस में 'आर्ट ऑफ ईटिंग' ही मोक्ष है। यहाँ का हलवाई खाना नहीं बनाता, वह 'मुक्ति का मार्ग' तैयार करता है।
अगले दिन मिस्टर जूलियन अपना सफेद शेफ कोट त्याग कर, एक मैला सा कुर्ता पहने, अस्सी घाट पर हाथ में चाय का कुल्हड़ लिए बैठे थे और सबको कह रहे थे— "बाबू, ज्ञान बाद में लेना, पहले कचौड़ी चापो, मोक्ष वहीं खड़ा है...
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