यथा खनन खनित्रेण भूतले वारी विदन्ति
तथा गुरु गतां विद्या सुश्रुष राधिगच्छति —चाणक्य
तथा गुरु गतां विद्या सुश्रुष राधिगच्छति —चाणक्य
शिष्ठता का प्रभाव दूर तक जाता है पर उसमे कुछ व्यय नहीं होता —सेमुअल स्माइल्स
परमात्मा से जितना हम अपना सम्बन्ध जोड़ेंगे उतनी ही शक्ति हमें प्राप्त होगी क्योंकि शक्ति वहीँ से आती है —स्वेत मोर्टन
मनुष्य नियम बनाते हैं स्त्रियां व्यवहार—-डी सागर
स्त्रियों की संगति उत्तम व्यवहार की नीव है —गेटे
सभ्य और सुन्दर व्यवहार हर जगह आदर पाने के लिए प्रवेश पात्र है —जॉनसन
मनुष्य का जीवन इसलिए है कि वह अत्याचार के विरुद्ध लड़े —सुभाषचन्द्र बोस
सच्चे कवि और द्रष्टा तो वे माने जाते हैं जो जीवन में मृत्यु और मृत्यु में जीवन देख सकें —गांधी
हमारा सबसे बड़ा मित्र आत्म विश्वास है –स्वामी विवेकानंद
चन्द्रमा अपना प्रकाश फैलाता है लेकिन कलंक अपने पास ही रखता है —रविन्द्र नाथ
प्रेम के बिना सेवा व्यर्थ है प्रेम के न होते हुए जो सेवा करता है तो वह प्रेम का व्यापार कर रहा है ऐसा समझना चाहिए —विनोबा
दूसरे मनुष्यों को जीतने की अपेक्षा अपने आप पर विजय पाना श्रेष्ठतर है —अशोक
जो अकेले में तुम्हारे दोषों को बतला दे उसे अपना सच्चा मित्र समझो —गांधी
विजय उसी को प्राप्त होती है जो विजय का साहस करता है —-गांधी
सत्य जीवन का केंद्र है और अहिंसा जीवन की प्रणाली —गांधी
जो हिम्मत करते हैं मंज़िल उन्ही को प्राप्त होती है –रॉबर्ट कैनेडी
गरीबों की सेवा ही ईश्वर की सेवा है –सरदार पटेल
पंखुड़ियां तोड़ कर तुम फूल का सौंदर्य नहीं पा सकते —रविन्द्रनाथ
दासता जीवन का सबसे बड़ा अभिशाप है —चन्द्र शेखर आज़ाद
उन्नति के लिए मार्ग बनाते जाना ही उन्नति का मार्ग है —-केनेडी
क्षमा से बढ़ कर और किसी बात में पाप को पुण्य बनाने की शक्ति नहीं है —जयशंकर प्रसाद
गुणों से मनुष्य महान बनता है ऊंचे आसन पर बैठने से नहीं महल के ऊँचें शिखर पर बैठने से कौआ गरुड़ नहीं हो सकता —चाणक्य
केवल सज्जनों में ही सच्ची मैत्री हो सकती है —-सिसरो
गुरु को अगर हमने देहरूप से माना तो हमने गुरु से ज्ञान नहीं अज्ञान पाया —-विनोबा
विद्या का अंतिम लक्ष्य चरित्र निर्माण होना चाहिए –गांधी
भूख लगे तो भोजन क्या और नींद लगे तो आसान क्या
भोजन करते समय शांत चित्त रहना चाहिए संसार की चिंताओं को चौके के बाहर छोड़ देना चाहिए। यदि आप बहुत उद्विग्न हो ,क्रोध में हो ,अधिक बीमार हो ,अशुद्ध वस्त्रों में हो ,बहुत दूर से पैदल चल कर आये हो तो तुरंत चौके में भोजन के लिए नहीं जाना चाहिए
कर्म वह आईना है जो हमारा स्वरुप हमें दिखा देता है अतः हमें कार्य का एहसानमंद होना चाहिए —विनोबा
सच्चे मनुष्यों के लिए कर्म मधुर सुगंध देते हैं और मिटटी में भी खिलते हैं
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