Wednesday, January 18, 2017

Dharm & Darshan !! 362 "Mantra Pushpanjali "

ॐ यज्ञेन यज्ञ मयजन्त देवा स्थानि धर्माणी प्रथमान्यासन। तेहनाकम महिमा न सचन्त यत्र पूर्वे साध्या सन्ति देवाः !ॐ राजाधिराजाय प्रसह्य साहिने नमो वयं वे श्रवणाय कुर्महे शामे कामान कामकामाय मह्यम कामेश्वरौ वै श्रवणों ददातु !कुबेराय वै श्रवणाय महाराजाय नमः !ॐ स्वस्ति साम्राज्यम भौज्य म ,स्वराज्य वैराज्यम पारमेष्ठयं राज्य महाराज्य माधिपत्यमयम सामंत पर्यायिस्यात सार्व  भौमः सार्वायुष आतां दा पराधति !प्रथिव्ये समुद्र पर्यंताया एकरकिती तदप्ये परलोकों भिगीतो मरुतः परिवेष्टासे मरुत्तस्या वसन गृहे अदीक्षितस्य काम प्रेर्विश्वे देवाः सभासद इति 
यानि कानि पापानि जन्मान्तरे कृतानिच 
तानि तानि विनश्चान्ति प्रदक्ष णा पदे पदे 
ॐ यज्जाग्रतो दूर मुदैती देवतदु सुप्तस्य तथैवेति 
दूरङ्गमं ज्योतिषाम ज्योतिरे कन्तनमे मनः शिव संकल्प मस्तु 
त्रयंबकम यजामहे सुगंधिम पुष्टि वर्धनम 
उरूवरूक मिव बन्धनान मृत्योर्मुक्षीय मामृतात !

Dharm & Darshan !! 361

असितगिरिसम स्यात्कज्जलं सिन्धुपात्रे 
--रतरुवर शाखा लेखनी पत्र मुर्वी 
----खाति यदि गृहीत्वा शारदा सर्वकालं 
तदपि ठाव गुणानामीश पारं न याति ! {Some words lost }

क्षमा प्रार्थना ------
अपराध सहस्त्राणि क्रियन्ते अहर्निशं मया 
दासो अ यमिति माम् मत्वा क्षमस्य परमेश्वरि !
आवाहनम न जानामि ,न जानामि विसर्जनं 
पूजाँचैव न जानामि क्षम्यतां परमेश्वरी !
मन्त्र हीनम क्रिया हीनम भक्ति हीनं सुरेश्वरि 
यत्पूजितं मया देवी परिपूरणः तदस्तुमे !
अपराध शतं कृत्वा जगदम्बे ति चोच्चरेत 
यां गति समवाप्नोति न ताम  ब्रम्हा दय सुरा !
सापराधोअस्मि शरणम प्राप्तस्त्वाम जगदम्बिके 
इदानि मनु कप्योअहम यथेच्छसि तथा कुरु !
अज्ञाना  द्विस्मरतेरभानतया यन्न्यूनमधिकम कृतं 
तत्सर्वं क्षम्यतां देवी प्रसीद परमेश्वरी !
कामेश्वरी जगन्मातर सच्चिदानंद विग्रहे 
गृहाणा रचा  मिमा  प्रीत्या प्रसीद परमेश्वरी !!
गुह्याति गुह्यम गोप्त्री त्वम ग्राहाणां स्मात्कृतं जपेत 
सिद्धिर्भवतु में देवी त्वत्प्रासादा सुरेश्वरि !

Dharm & Darshan !!360

साष्टांग नमस्कार-----उरसा ,शिरसा ,दृष्टया ,मनसा ,पदभ्याम ,कराभ्याम ,जानुभ्याम --एतद अष्टांग लक्षणम 

भजन ----अब सौंप दिया इस जीवन का सब भार तुम्हारे हाथों में 
है जीत तुम्हारे हाथों में ,है हार तुम्हारे हाथों में 
मेरा निश्चय बस एक यही इक बार तुम्हे पा जाऊं मैं 
अर्पण कर दूँ दुनिया भर का सब प्यार तुम्हारे हाथों में --भगवान् तुम्हारे हाथों में 
जो जग में रहूँ तो ऐसे रहूँ ज्यों जल में कमल का फूल रहे 
मेरे सब गुणदोष समर्पित हों भगवान् तुम्हारे हाथों में --भगवान् तुम्हारे हाथों में 
यदि मानव का मुझे जन्म मिले तो तव चरणों का पुजारी बनूँ 
इस पूजक की एक एक रग का हो तार तुम्हारे हाथों में --भगवान् तुम्हारे हाथों में 
जब जब संसार का कैदी बनूँ निष्काम भाव से कर्म करूँ 
फिर अंत समय में प्राण तजूं साकार तुम्हारे हाथों में। भगवान् तुम्हारे हाथों में 
मुझमे तुझमे बस भेद यही ,मैं नर हूँ तू नारायण है 
मैं हूँ संसार के हाथों में ,संसार तुम्हारे हाथों में --भगवान् तुम्हारे हाथों में !

Tuesday, January 17, 2017

Dharm & Darshan !! 359 Shri Guru Gita !!

{अथ  श्री गुरुगीता प्रारंभ }

ॐ अस्य श्री गुरु गीता स्त्रोत्र मंत्रस्य भगवान 
सदाशिव ऋषि। नाना विधानी छन्दासि। 
श्री गुरु परमात्मा देवता। हम बीजम। सः  शक्तिः। 
क्रो  कीलकम। श्री गुरुप्रसाद सिद्धयर्थे जपे विनियोगः 

{ अथ  ध्यानम }
हंसाभ्या परिवृत्त कमलै दिव्ये रजत कारनै 
विश्वोत्तकीर्ण मानेक देह निलये स्वच्छन्द मातमेन्द कं 
तद्योतम पदशाभवम तू चरणम दीपां कुर  ग्राहिणम 
प्रत्यक्षाक्षर विग्रह गुरुपदम ध्याये द्विभुम शाश्वतं 
मम चतुर्विध पुरुषार्थ सिद्धयर्थे जपे विनियोग !

संसारवृक्ष मारूढा हा पतंति नरकार्णवे 
एंव घृत मिदं तस्मै श्री गुरुवै  नमः 

गुरु ब्रम्हा गुरु विष्णु गुरु देवो महेश्वर 
गुरु साक्षात् पर ब्रम्ह तस्मै श्री गुरुवै नमः 

अज्ञान तिमिरान्धस्य ज्ञानांजन शलाकया 
चक्षु रुन्मिलित येन तस्मै श्री गुरुवै नमः 

अखंड मंडलाकारम व्याप्तम येन चराचरम 
तत्पद दर्शितं येन तस्मै श्री गुरुवै  नमः 

स्थावर जंगमं व्याप्तम यत्किञ्चितं स चराचरम 
तत्पदं दर्शित येन तस्मै श्री गुरुवै  नमः 

सर्व श्रुति  शिरोरत्न बिराजित पदांबुजं 
वेदांताबूज सूर्योय तस्मै श्री गुरुवै नमः 

चैतन्यम शाश्वतं शान्तम व्योमातीतं निरंजनम 
विन्दुनाद कलातीतं तस्मै श्री गुरुवै नमः 

ज्ञानशक्ति समारुढा सत्त्व माला विभूषितः 
भुक्ति मुक्ति प्रदातनच तस्मै श्री गुरुवै नमः 

अनेक जन्म सम्प्राप्त कर्मबंध विदाहिने 
आत्मज्ञान प्रदानेन तस्मै श्री गुरुवै नमः 

शोषणम भवसिंधुश्च ज्ञापनम सार सम्पदाम 
गुरो पादोदकं सम्यक तस्मै श्री गुरूवै नमः 

न गुरोरधिकं तत्वम न गुरोरधिकं तपः 
तत्वज्ञानात परम नास्ति तस्मै श्री गुरूवै नमः 

मन्नाथः श्री जगन्नाथः मद्गुरु श्री जगतगुरु 
मदात्मा सर्व भूतात्मा तस्मै श्री गुरूवै नमः 

गुरुरादिर नादिस्च गुरुः परम देवतां 
गुरो परतरम्भ नास्ति तस्मै श्री गुरूवै नमः 

अखण्डानन्द बोधाय शिष्य संताप हारिणे 
सच्चिदानंद रूपाय तस्मै  श्री गुरूवै नमः 

यस्य कारण रूपस्य कार्य रूपेण भक्तियत 
कार्य कारण रूपाय तस्मै श्री गुरूवै नमः 

यत्सत्येन जगत सत्यम यत प्रकाशेन भांतियत 
याद ननदें नन्दन्ति तस्मै श्री गुरूवै नमः 

यस्य ज्ञानम दिदम विश्वम न द्रश्य भिन्न भेदतः 
सडक रूप रूपाय तस्मै श्री गुरूवै नमः 

यस्यामत तस्य मत मतं यस्य न वेद सः 
अनन्य भाव भावाय तस्मै श्री गुरूवै नमः !!


Dharm & Darshan !! 358

आनंद मानंद करं प्रसन्नम 
ज्ञान स्वरूपम निज बोध युक्तम 
योगिंद्र मिअयम भक्तेन वैद्य 
श्रीमद गुरु नित्यं महम नमामि 

यास्मीन सृष्टि स्थिति ध्वंस 
निग्रहानुग्रात्मकम 
कृत्य पञ्च विधः शश्व 
भासते तं  नामाम्यहम 
प्रातः शिरसि शुक्लाब्जे 
द्विनेत्र द्विभुज गुरुम 
वराभय युतं शांतं 
स्मरेण  नाम पूर्वकम 

न गुरोराधिकम न गुरोराधिकम न गुरोराधिकम न गुरोराधिकम 
शिवशासनतः शिवशासनतः शिवशासनतः शिवशासनतः 

इदमेव शिवम त्विदमेवशिवं 
 त्विदमेवशिवं  त्विदमेवशिवं 
मम शासनतो मम शासनतो 
मम शासनतो मम शासनतो 

Dharm & Darshan !! 357

शान्ताकारम भुजगशयनं पद्मनाभम सुरेशं
विश्वाधारं  गगनसदृश्यम मेघवर्णम शुभांगम
लक्ष्मीकांतं कमलनयंम योग विरध्यान गम्यम
वनडे विष्णु भव भय हरम सर्व लौकेक नाथम!

समुद्रवसने देवी पर्वतस्तन मंडले
विशनी पत्नि नमस्तुभ्यम पादस्पर्श क्षमस्व में !!

शांतं शाश्वतं प्रमेय मनधम निर्वाण शांति प्रदे
ब्रम्हा शम्भू फणीन्द्र सेव्य मानिषम वेदांत वेद्यम विभुम
रामाख्यम जगदीश्वरं सुरगुरुम माया मनुष्यम हरी
वंदेहं करुणाकरं रघुवरम भूपाल चूड़ामणि !!

नान्या स्पृहा रघुपते ह्रदये  अस्मदीये
सत्यम वदामि च भवना खिलान्त रात्मा
भक्ति प्रयच्छ रघु पुंगव निर्भरां में
कामादि दोष रहितं कुरु मानसं च

ध्यानम श्रुणु महादेवी सर्वानंद प्रदायक
सर्व सौख्य कर्म नित्यं भुक्ति मुक्ति विधायकम
श्रीमद परब्रम्हगुरुम  स्मरामि
श्रीमद परब्रम्ह गुरुम यजामी
श्रीमद परब्रम्ह गुरुम नमामि
श्रीमद परब्रम्ह गुरुम भजामि

ब्रम्हानंदं परम सुखदम केवलं ज्ञानमूर्ति
द्वंद्वातीतं गगन सदृश्यम तत्वमस्यादिलक्षयम
एक नित्यं विमल मचलं सावधि साक्षीभूतं
भावातीत त्रिगुण रहितं सद्गुरु तम नमामि

नित्यं शुद्धम निराभासम निराकारं निरंजनम
नित्य बोध चिदानंदम सद्गुरु तं  नामाम्यहम
ह्रदभुजे कार्णिक मध्य संस्थे
सिंहासने संस्थित दिव्य मूर्तिम
ध्यायेत गुरु चंद्रकला प्रकाशम
चित पुस्तका भिष्ट वरम दधानम

श्वेताम्बरम श्वेत विलेप पुष्पम
मुक्ताम विभूषम मुदितं द्विनेत्रम
वामार्कपीठ स्थित दिव्य शक्ति
मन्दस्मितम सान्द्र कृपा निधानम 

Dharm & Darshan !! 356

महा लक्ष्मी नमस्तुभ्यं नमस्तुभ्यं सुरेश्वरी 
हरिप्रिये नमस्तुभ्यं नमस्तुभ्यं दयानिधे 
नमस्तेस्तु महामाये श्री पीठे सुरपूजिते 
शंख चक्र गदा हस्ते महालक्ष्मी नमोस्तुते
नमस्ते गरुडारूढे कोलासुर भयंकरी 
सर्व पाप हरे देवी महा लक्ष्मी नमोस्तुते  
सर्वज्ञे सर्व वरदे सर्व दुष्ट भयंकरि 
सर्वदुख हरे देवी महालक्ष्मी नमोस्तुते 
सिद्धि बुद्धि प्रदे देवी भुक्ति मुक्ति प्रदायिनी 
मन्त्रपूते महादेवी महा लक्ष्मी नमोस्तुते 
आद्यंत रहिते देवी आद्यशक्ति महेश्वरी 
योगजे योग सम्भूते महालक्ष्मी नमोस्तुते 
स्थूल सूक्ष्म महा रौद्रे महाशक्ति महोदरे 
महा पाप हरे देवी महा लक्ष्मी नमोस्तुते 
पद्मासना  स्थिते देवी परब्रम्ह स्वरूपिणी 
परमेशि जगन्मातर महा लक्ष्मी नमोस्तुते 
श्वेताम्बरा धरे देवी नानालंकार भूषिते 
जगत्स्थिते जगन्मातर महालक्ष्मी नमोस्तुते 
महालक्ष्म्यष्टकं स्त्रोत्रम यः पठेत भक्ति मान्नरः 
सर्वसिद्धिमवाप्नोति राज्यम प्राप्नोति सर्वदा 
एक काले पठेनित्यम महापाप विनाशनम 
द्विकालं यह पठेन्नित्यं धनधान्य समन्वितः 
त्रिकालं यह पठेन्नित्यं महा शत्रु विनाशनम 
महालक्ष्मीर्भवे न्नित्यम प्रसन्ना वरदा शुभा !!