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शनिवार, 17 सितंबर 2016

Khaas-o-Aam !!

ख़ास - ओ - आम !!

जब आये थे तुम ,
तो गज़ भर लंबी थी तुम्हारी ज़ुबान,
"मोदी जी "ये "मोदी जी"वो
अम्बानी ,अडानी ,
"मैं" तो बस "आप का " "आप सा"ही एक "आम"
तुमने पका दिए थे "कान"
अब तो पहचाने नहीं जाते तुम ,
जाता ही नहीं तुम्हारा "आम" की और ध्यान
टाल नहीं सकते ,"जल भराव"और उससे फैली
बीमारियों को दूसरों के सर मढ़ कर ,
पहले तो बात बात पे "धरना"दिया करते थे तुम ,
याद है सबको तुम्हारी धरने की दास्तान,
अब क्यों बैठे हो छुप्पी ठान ,
सोशल मिडिया पर लोगों ने लगा दिए शिकायतों के अम्बार
लेकिन सब बेकार सब बेकाम
लगता है फ़िज़ूल ही हमने ,सौंपी थी तुमको दिल्ली की कमान ,
कोई फर्क नहीं रहा ,तुम में और "औरों" में ,
वो भी नंगे थे और तुम भी नंगे हो चुके हो इस "हम्माम"
सम्हाले नहीं सम्हलते,तुमसे अपने ही लोग ,
"कभी ये ""कभी वो"के कटते रहते हैं "चालान"
तुम्हे फुर्सत कहाँ ,हमारी ओर देखने की ,
क्योंकि तुम बन गए हो "ख़ास"
हम अभी भी हैं "आम "!!

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