मेरे बारे में---Nirupama Sinha { M,A.{Psychology}B.Ed.,Very fond of writing and sharing my thoughts

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शुक्रवार, 8 दिसंबर 2017

Vishuddha Vyapaar !!

विशुद्ध व्यापार ---
आटा दाल सब्जी का अबतक देखा करते थे व्यापार 
कभी सस्ता कभी महंगा,कभी रोता कभी हँसता 
दुकान दार और कभी खरीदार 
विद्या का मंदिर होती थी पाठशाला हमारी 
अब English Medium  के दिखते हर ओर
भारी भरकम अंग्रेजी नामो के Convent,Academy या Cloister,
School में बिकते Book Set,Uniform, भी 
समोसे,Patties Burger सबकी भरमार 
पहले एक ही होता था ,सरकारी अस्पताल
अच्छे भले होते थे डॉक्टर 
व्यक्तिगत सम्बन्ध निबाहते,जब करते थे उपचार 
अब Private की चकाचौंध निराली 
संसाधनों से परिपूर्ण ,चमचमाते  Five Star 
यहाँ Beauty Parlour से बिकते Package 
Menu Card से खुल्लमखुल्ला,ताल ठोकते 
मिली भगत के ये व्यापार 
दुगनी तिगनी दसगुनी कीमत पर 
साधारण चीजों की लूटमार 
इतने पर भी यदि ,मरीज की हो सही देखभाल 
हो सही उपचार 
तो शायद मैं कभी ना लिखती ये कविता के उदगार 
किन्तु जब मुर्दा को ज़िंदा दिखाकर 
या ज़िंदा को मुर्दे सा Pack कर 
मरीज़ों के अपनों को सौंपा गया लाखों का बिल 
तो अंतरात्मा ने झिंझोड़ा मुझको 
वितृष्णा से भर गया है मन 
मानव की ,उसके अंगों की तस्करी,
और ये Rackets चलाते  मानो ये ही उनका कारोबार 
सबकुछ बिक रहा देश में 
एक ही तौल पर तुलता सबकुछ 
सबकुछ है विशुद्ध व्यापार !!

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