लीला पेरलेकर : एक अविस्मरणीय व्यक्तित्व !!
इसलिए नहीं कि वो मेरी माँ थी , अपितु इसलिए कि वह सदैव ही अपने विद्यालय की समस्त छात्राओं की और स्टाफ़ के सभी टीचर्स की माँ - मातृ तुल्य रहीं , उनका अनुशासन भी सहर्ष स्वीकार्य था सभी को । जन्मगत धनाढ़्य परिवार में जन्म लेकर भी , पिता की अल्पायु में मृत्यु के कारण उन्हें अपना शिक्षण भी कठोर विपरीत परिस्थितियों में करना पड़ा । उन्हें शिक्षा प्राप्ति की इतनी लगन थी कि वे एकबार बचपन में संडे को भी स्कूल जा पहुँची और एक बार जब नानी सभी बच्चों को साथ लेकर कलकत्ता जाने लगी तो उन्होंने मना कर दिया कि वे स्कूल में अनुपस्थित नहीं रहना चाहती और दो बड़े भाइयों के साथ इंदौर में ही रह गईं । यह 1937 का वर्ष था और नानी के जाने के बाद एक बड़ा भूकम्प आया था । उन्होंने अपने फ़ौजी भाई के यहाँ रह कर B.A. किया , धनाभाव के कारण ,पुस्तकें वे कॉलेज पुस्तकालय से इशु करवा कर , पीले पीले से रफ़ पेपर्स पर पूरी किताब ही उतार लिया करतीं थीं, बाद में इंदौर क्रिस्चियन कॉलेज से इतिहास में एम॰ए. किया यहाँ उनकी मेरे पिता श्री पुरुषोत्तम गोविन्द पेरलेकर से भेंट हुई ।वे एक प्रभावशाली व्यक्तित्व के स्वामी थे तथा ज्ञान का अथाह सागर थे । दोनो ने एक दूसरे को पसंद किया तथा विवाह बंधन में बंध गए । L. T. की ट्रेनिंग के उपरांत वे नौकरी के लिए प्रयास करने लगीं । इस संदर्भ में वे तत्कालीन शिक्षा मंत्री से भी मिलीं । मंत्री जी बोले " औरत का काम चूल्हा फूंकना होता है " तब मम्मी ने मंत्री जी से कहा " मैं नौकरी भी कर लूँगी और चूल्हा भी फूँक लूँगी " और उन्होंने आजीवन दोनो ही कार्य सुचारू रूप से किए । वे बड़ा गणपति, पागनिस पागा में कार्यरत रहीं , कालांतर में मंदसौर के लक्ष्मी बाई उच्चतर माध्यमिक विद्यालय में व्याख्याता के रूप में कार्यरत रहीं । वहाँ से सीतामऊ नामक स्थान पर प्राचार्या के रूप में स्थानांतरित हुईं । यह एक छोटी सी रियासत थी । उस समय तक यहाँ का स्कूल राजघराने के घुड़साल में चल रहा था तथा नई बिल्डिंग बन रही थी जो जेष्ठ राजकुमार डॉक्टर रघुवीर सिंह के अथक प्रयासों से उनकी माता सरस कुँवर के नाम से स्थापित हुई , अर्थात सरस कुँवर उच्चतर माध्यमिक विद्यालय कहलाया ज्ञातव्य है कि छात्रों का विद्यालय वहाँ के महाराजा के नाम से श्रीराम विद्यालय पहले ही से विद्यमान था । उस समय लोग प्राथमिक माध्यमिक तक तो लड़कियों की शिक्षा के समर्थक थे । आगे की शिक्षा हेतु मम्मी तथा अन्य अध्यापिकाओं ने अभिभावकों से सम्पर्क साधा, वे लोग यूनीफ़ॉर्म के लिए भी तब सहमत हुए जब मेरून स्कर्ट और पीला ब्लाउज़ निश्चित किया गया । मम्मी ने अध्यापिकाओं के लिए भी यूनी फ़ॉर्म तय किया था , उनका कहना था कि छात्राओं से यूनी फ़ॉर्म पहनने को कहना तभी अच्छा लगता है जब अध्यापिकाएँ स्वयं इसका अनु पालन करे। वे स्वयं सिम्पल लिविंग हाई थिंकिंग के विचार का पालन करती थीं । वे बहुत स्ट्रॉंग चरित्र की महिला थीं और उतनी ही कोमल ह्रदया भी । रिटायर होने से पूर्व वे राधाबाई उच्चतर माध्यमिक विद्यालय देवास तथा बाद में मालव कन्या उच्चतर माध्यमिक विद्यालय में कार्य रत रहीं ।उन्होंने सभी की सहायता भी की एवं मार्गदर्शन भी किया ।आज ऐसे कई लोग हैं जिन्होंने उन्हें देख कर , उनकी प्रेरणा से अथवा उनके मार्गदर्शन से अपने अपने जीवन सँवार लिए । मम्मी का स्वर्गवास 2 ऑक्टोबर 2015 को हुआ किंतु उनकी उपस्थिति आज भी मधुर स्मृति के रूप में कईयों के ह्रदयों में स्थित है और हम तीनों भाई बहन तो कभी अपने माता पिता को भूल ही नहीं पाए ।वे प्रति क्षण हमारे साथ हैं , अपने आशीर्वाद के साथ !!
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