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मंगलवार, 8 नवंबर 2016

Late Shri Purushottam Govind Perlekar's Sankalan !! {155}

देखा था हमने राज जो, वह अब अयाँ नहीं,
 दिल किस तरह बताए कि उसको जुबां नहीं! 

यही तो खूबी है राहे खुदा की मंजिल की ,
मंजिल आ जाती है राही कहीं नहीं जाता!

दुखों से अगर चोट खाई न होती 
तुम्हारी प्रभु याद आई न होती 
कभी   जिंदगी में ये आँखे न खुलती ,
अगर रोशनी तुमसे   पाई न होती,   
कहीं पर मुझे चैन मिलता न जग में,
जो तुमने मुसीबत मिटाई न होती, 
बनी तुमसे लाखों की हम मानते क्यों ,
हमारी जो बिगड़ी बनाई न होती,
 से पतित की भला कौन सुनता,
 तुम्हारे यहाँ जो सुनायी न होती!

जब से सुना है यार लिबासे बसर में है,
अब आदमी कुछ  हमारी नज़र में है!

मेरे अजमे सफ़र की रविश देख कर,
रूबरू खिंच के मंजिल मेरी आ गई! 

मज़ा उस वक़्त आता है जब दिल से दिल मिलता है,
मगर मुश्किल तो ये है दिल बड़ी मुश्किल से मिलता है!

दिल से नजदीक है आँखों से बहुत दूर नहीं,
मगर उस पर भी मुलाकात उन्हें मंज़ूर नहीं!

मिले हैं उनसे कल और ख्याल आने लगा,
उनको मिले हुए बरसों गुजर गए!

याद है तो आबाद है,भूल गया तो बर्बाद है!

मुद्दई लाख बुरा चाहे तो क्या होता है,
होता है वही जो मंजूरे खुदा होता है!


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