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शनिवार, 5 नवंबर 2016

Late Shri Purushottam Govind Perlekar's Sankalan !! {160}

जो बात कहो साफ़ हो सुथरी हो,भली हो,
कड़वी न हो,खट्टी न हो,मिश्री की डली हो!

नाज़ भी होता रहे होती रहे बेदाद भी,
सब गवारा है हमें सुनते रहो फरियाद भी!

जो उस गुल पे तबियत तेरी आयी होती,
बागे आलम की न आँखों में सच्चाई होती!

तेरी   ही याद में है गाफिल ए खालिक खलक,
पूछने गैर से हम अपनी खबर जाते हैं!

राही कहीं है राह कहीं राहबर कहीं,
ऐसा भी कामयाब हुआ है सफ़र कहीं!

निकाला  गुबार दिल से सफाई तो हो गयी,
अच्छा किया जो ख़ाक में मुझको मिला दिया!

कह रहा है आसमा,यह सब समा कुछ भी नहीं,
पीस दूंगा एक एक गर्दिश में जहाँ कुछ भी नहीं!

घर कौन सा बसा कि वीरां न हो गया,
गुल कौन सा हंसा कि परेशां न हो गया!

जिनके हंगामों से आबाद थे वीराने कभी,
शहर उनके मिट गए आबादियाँ बन हो गयीं!

हाँ! खइयो मत फरेबे हस्ती,
हर चन्द कहे कि है ,नहीं है!

ऐ जौक अगर है होश तो दुनिया से दूर भाग,
इस मयकदे में काम नहीं होशियार का!

टुक देख आँख खोलके,उस दम की हसरतें,
जिस दम ये सूझेगी कि ये आलम भी ख्वाब था!

इस हस्तिय मौ हूम पै गफलत में न खो उम्र,
बेदार हो आगाह,भरोसा नहीं दम का!

है ताक में उकाब तो शाहबाज़ घात में,
हमले से यां अज़ल के नहीं एकदम फराग!

मुद्दत तलक जहां में हँसता फिर किये,
जी में है रोइये अब बैठ कर कहीं!

लाई हयात आये कज़ा तो चली चले,
अपनी ख़ुशी न आये न अपनी ख़ुशी चले!

अज़ल से वो डरे जीने को जो अच्छा समझते हैं,
यहाँ हम चार दिन की जिंदगी को क्या समझते हैं!

आये भी लोग बैठे भी उठ भी खड़े हुए ,
मैं जां ही ढूंढ़ता  तेरी महफ़िल में रह गया!

देखे जिसे है राहे फ़ना की तरफ खां ,
तेरी महल सरां  का यही रास्ता है क्या!

आदमी को मयस्सर नहीं इन्सां होना!

जानवर आदमी फ़रिश्ता खुद़ा ,
आदमी की भी है सैकड़ों किस्में!

ही फ़रिश्ता तो भी नहीं इन्सां ,
दर्द थोडा बहुत न हो जिसमे!

दर्द दिल के वास्ते पैदा किया इंसान को,
वर्ना ताअत के लिए कर्रे बयां कुछ कम न थे!

फरिश्तों से बेहतर है इन्सान बनना,
मगर इसमें पड़ती है मेहनत जियादह !

इश्क के रुतबे के आगे आसमा भी पस्त है,
सर झुकाया है फरिश्तों ने बसर के सामने!




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