पढ़िए इसके सिवा न कोई सबक,
खिदमते खल्क औ इश्के हजरते हक !
खिदमते खल्क औ इश्के हजरते हक !
खाली है जामे जीस्त,और कह रही है मौत,
लबरेज तेरी उम्र का पैमाना हो गया!
लबरेज तेरी उम्र का पैमाना हो गया!
ग़ालिब की शायरी—–
न सुनो गर बुरा कहे कोई,
न कहो गर बुरा करे कोई,
रोक लो गर गलत चले कोई,
बख्श दो गर खता करे कोई!
न कहो गर बुरा करे कोई,
रोक लो गर गलत चले कोई,
बख्श दो गर खता करे कोई!
अगर अपना कहा आप ही समझे तो क्या समझे,
मज़ा करने का जब है एक कहे और दूसरा समझे !
मज़ा करने का जब है एक कहे और दूसरा समझे !
न था कुछ तो खुदा था,
कुछ न होता तो खुदा होता,
मिटाया मुझको होने ने
न होता मैं तो क्या होता!
कुछ न होता तो खुदा होता,
मिटाया मुझको होने ने
न होता मैं तो क्या होता!
रहिये अब ऐसी जगह चल कर जहाँ कोई न हो,
हम सुखन कोई न हो,हम जुबां कोई न हो,
बे दरो दीवार का एक घर बनाया चाहिए,
कोई हमसाया न हो,और पासवां कोई न हो,
पड़िये गर बीमार तो कोई न हो तीमार दार,
और गर मर जाइये तो नौहख्वा कोई न हो !
हम सुखन कोई न हो,हम जुबां कोई न हो,
बे दरो दीवार का एक घर बनाया चाहिए,
कोई हमसाया न हो,और पासवां कोई न हो,
पड़िये गर बीमार तो कोई न हो तीमार दार,
और गर मर जाइये तो नौहख्वा कोई न हो !
हजारों ख्वाहिशें ऐसी के हर ख्वहिश पे दम निकले
बहुत निकले मेरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले!
बहुत निकले मेरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले!
मजहब कोई लौटा ले ,और उसकी जगह दे दे,
तहजीब सलीके की,इंसान करीने के !
तहजीब सलीके की,इंसान करीने के !
हिजोएमय ने तेरा ए शोख !भरम खोल दिया ,
तू तो मस्जिद में है,नीयत तेरी मयखाने में!
तू तो मस्जिद में है,नीयत तेरी मयखाने में!
जो जहर हलाहल है अमृत भी वही लेकिन,
मालूम नहीं तुमको अंदाज़ ही पीने का!
मालूम नहीं तुमको अंदाज़ ही पीने का!
अदा दिखा के तेरी शान बेनियाज़ी की ,
नियाजमंदी के काबिल बना दिया तुमने!
नियाजमंदी के काबिल बना दिया तुमने!
आईने चारों तरफ लेकिन मुकाबिल एक है,
मंजिल हर सिम्त लेकिन मीर मंजिल एक है!
मंजिल हर सिम्त लेकिन मीर मंजिल एक है!
हज़ार जाम तसद्दुक ,हज़ार मयखाने,
तेरी नज़र की लताफत,शराब क्या जाने!
तेरी नज़र की लताफत,शराब क्या जाने!
जहाँ चोट खाना वहीँ मुस्कुराना,
मगर इस अदा से के रो दे ज़माना!—मजाज़ लखनवी
मगर इस अदा से के रो दे ज़माना!—मजाज़ लखनवी
काबे वालों से जो पूछी मैंने मंजिल यार की,
तो बुतकदे की और चुपके से इशारा कर दिया!
तो बुतकदे की और चुपके से इशारा कर दिया!
वही है आरिफ ए बिल्ला और वही सूफी,
के जिसको गम से न गम हो,ख़ुशी ख़ुशी न रहे!
के जिसको गम से न गम हो,ख़ुशी ख़ुशी न रहे!
गुनाहगारों में शामिल हम गुनाहों से नहीं वाकिफ ,
सजा तो जानते हैं हम,नहीं जानते खता क्या है!
सजा तो जानते हैं हम,नहीं जानते खता क्या है!
सामने तेरे जैसे कोई बात याद आ आके भूल जाती है,
कोई आया न आएगा लेकिन क्या करें गर इंतज़ार न करें !
कोई आया न आएगा लेकिन क्या करें गर इंतज़ार न करें !
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