खुशबू वही वही है नजाकत,
माशूक क्या है तू?फूल है तू भी गुलाब का!
माशूक क्या है तू?फूल है तू भी गुलाब का!
ज़ुल्फ़ आहिस्ता झटकिये,मेरा जी डरता है,
देखिये हाथ का झटका ,न कमर तक पहुंचे!
देखिये हाथ का झटका ,न कमर तक पहुंचे!
सम्हल कर पाँव रखिये जमीं पर,
अगर चाल बिगड़ी तो बिगाड़ा चलन भी !
अगर चाल बिगड़ी तो बिगाड़ा चलन भी !
फूल थे गैर की किस्मत में अगर ए ज़ालिम ,
तूने पत्थर ही मुझे फेंक के मार होता!
तूने पत्थर ही मुझे फेंक के मार होता!
क्या कहिये किस तरह जवानी गुजर गयी,
बदनाम करने आयी थी बदनाम कर गयी!
बदनाम करने आयी थी बदनाम कर गयी!
आँख से आँख लड़ी पर मुझे डरहै दिल का ,
कहीं ये जाये ना इस जंग ओ जलाद में मारा ! जौक
कहीं ये जाये ना इस जंग ओ जलाद में मारा ! जौक
भरी महफ़िल में हर यक बचा कर,
तेरी आँखों ने मुझसे बात कर ली !–फिराक
तेरी आँखों ने मुझसे बात कर ली !–फिराक
ये निराली हया निकली है,
बात करते हैं ढांक कर आँखे!—दाग—
बात करते हैं ढांक कर आँखे!—दाग—
आहट पे कान दर पे नज़र,दिल में इश्तियाक
कुछ ऐसी बेखुदी है इंतज़ार में!—ग़ालिब
कुछ ऐसी बेखुदी है इंतज़ार में!—ग़ालिब
आये तो यूँ जैसे हमेशा थे मेहरबां,
भूले तो यूँ जैसे कभी आशना न थे !
भूले तो यूँ जैसे कभी आशना न थे !
क्या क्या ख्याल ओ वहम निगाहों पे छा गए ,
जी धक् से रह गया ,जब सुना वो आ गए!
जी धक् से रह गया ,जब सुना वो आ गए!
इस तरह दिल में असर कर गयी है उल्फत तेरी,
सबकी सूरत में नज़र आती है सूरत तेरी!
सबकी सूरत में नज़र आती है सूरत तेरी!
मज़ा आता अगर गुज़री हुई बातों का अफसाना ,
कहीं से तुम बयाँ करते कहीं से हम बयाँ करते!
कहीं से तुम बयाँ करते कहीं से हम बयाँ करते!
बे तुम्हारे जी गयी अब तक ,
तुम्हे क्या खुद मुझे भी यकीं नहीं!
तुम्हे क्या खुद मुझे भी यकीं नहीं!
कौन कहता है तुझे मैंने भूला रखा है,
तेरी यादों को कलेजे से लगा रखा है,
लैब पे आहें भी नहीं,आँख में आंसू भी नहीं,
मैंने हर राज़ मोहब्बत का छुपा रखा है!
तेरी यादों को कलेजे से लगा रखा है,
लैब पे आहें भी नहीं,आँख में आंसू भी नहीं,
मैंने हर राज़ मोहब्बत का छुपा रखा है!
कुछ कुसूर काबिले यकीं होते हैं,
कुछ गुमराह भी बहुत ज़हीन होते हैं,
कुछ गलतियाँ दोहराने लायक होती हैं,
कुछ गुनाह वाकई हसीन होते हैं!
याद में तेरी जहां को भूलता जाता हूँ मैं,
भूलने वाले क्या तुझे कभी याद आता हूँ मैं?
कुछ गुमराह भी बहुत ज़हीन होते हैं,
कुछ गलतियाँ दोहराने लायक होती हैं,
कुछ गुनाह वाकई हसीन होते हैं!
याद में तेरी जहां को भूलता जाता हूँ मैं,
भूलने वाले क्या तुझे कभी याद आता हूँ मैं?
मैं परेशान हूँ तो वो हैं बेकरार,
मेरी उनकी एक हालत हो गई!
मेरी उनकी एक हालत हो गई!
ले चला जान मेरी रूठ के जाना तेरा,
ऐसे आने से तो बेहतर था न आना तेरा!
ऐसे आने से तो बेहतर था न आना तेरा!
यूँ ख़ाक में मिला के न अरमान जाइये,
गुस्से को थूक दीजिये बस मान जाइये!
गुस्से को थूक दीजिये बस मान जाइये!
काटी है मोहब्बत में तो हर तरह की रातें,
दिल आज धड़कने लगा क्यों शाम से पहले!
दिल आज धड़कने लगा क्यों शाम से पहले!
एक उम्र कट गयी,तेरे इंतज़ार में,
ऐसे भी हैं,कट न सकी जिनकी एक रात!
ऐसे भी हैं,कट न सकी जिनकी एक रात!
दिल को हर तरह से दिलासा दिया करूँ,
आँखें तो मानती नहीं,इनका क्या करूँ?
आँखें तो मानती नहीं,इनका क्या करूँ?
तुमने तो पास न आने की बस खाई थी कसम,
किस्मत से आज खिंच के मेरे पास आ गए!
किस्मत से आज खिंच के मेरे पास आ गए!
हर इश्क के मारे का बस इतना ही फ़साना है,
रोने को नहीं कोई हंसने को ज़माना है!
रोने को नहीं कोई हंसने को ज़माना है!
कौन कहता है कि तुम चाँद जैसे हो,
हकीकत ये है कि चाँद तुम जैसा है!
तेरी जिंदगी में खिले फूल ऐसे कि
खिजां भी अपना दामन बचाए,
तेरे गुलिस्तां में कुछ ऐसी कशिशे हों,
कि बहार जो आये तो वापस न जाये!
खिजां भी अपना दामन बचाए,
तेरे गुलिस्तां में कुछ ऐसी कशिशे हों,
कि बहार जो आये तो वापस न जाये!
दिल नाउम्मीद तो नहीं नाकाम ही तो है,
लम्बी है गम की शाम मगर शाम ही तो है!
लम्बी है गम की शाम मगर शाम ही तो है!
खेल रहा हूँ पुरानी यादों से,
यही तो आखरी कोशिश है भूल जाने की!
यही तो आखरी कोशिश है भूल जाने की!
एक मुद्दत से तेरी याद भी आई नहीं,
और हम भूल गए हों तुझे ऐसा भी नहीं!
और हम भूल गए हों तुझे ऐसा भी नहीं!
उसने दिल की हालत का क्या असर लिया होगा,
दिल ने क्या कहा होगा दिल है बेजुबां अपना!
दिल ने क्या कहा होगा दिल है बेजुबां अपना!
दौलत मिली है इश्क की अब और क्या मिले
वह चीज मिल गई है जिससे खुदा मिले!
वह चीज मिल गई है जिससे खुदा मिले!
तेरे वादे पे जिए हम तो ये जान झूठ जाना,
कि ख़ुशी से मर न जाते अगर ऐतबार होता.–ग़ालिब–
कि ख़ुशी से मर न जाते अगर ऐतबार होता.–ग़ालिब–
मोहब्बत में नहीं है फर्क जीने और मरने का ,
उसी को देख कर जीते हैं जिस काफ़िर पे दम निकले–ग़ालिब–
उसी को देख कर जीते हैं जिस काफ़िर पे दम निकले–ग़ालिब–
इश्क पर जोर नहीं ये वो आतिश है ग़ालिब,
जो लगाए न लगे और बुझाए न बुझे!
जो लगाए न लगे और बुझाए न बुझे!
हम हैं मुश्ताक {उत्सुक}और वो बेज़ार,
या इलाही ये माज़रा क्या है —ग़ालिब
या इलाही ये माज़रा क्या है —ग़ालिब
आगे आती थी हाले दिल पे हंसी
अब किसी बात पर नहीं आती!
अब किसी बात पर नहीं आती!
हम वहां हैं जहाँ से हमको भी कुछ
हमारी खबर नहीं आती!
हमारी खबर नहीं आती!
नुक्ताचीं है गेम दिल उसको सुनाये न बने,
क्या बने बात जहाँ बात बनाये न बने!
क्या बने बात जहाँ बात बनाये न बने!
जो शाख टूटती है लचकती ज़रूर है,
बुझने से पहले शमा फड़कती ज़रूर है,
होता है जिसको दावा किसी कि तलाश का,
कहते हैं वो निगाह भटकती जरूर है,
जो जाम छू लिया किसी बेशहुर ने,
उस जाम से शराब छलकती ज़रूर है,
वो हुस्न क्या जो सैकड़ों पर्दों में छुपा हो,
बिजली है जिसका नाम वो चमकती ज़रूर है!
बुझने से पहले शमा फड़कती ज़रूर है,
होता है जिसको दावा किसी कि तलाश का,
कहते हैं वो निगाह भटकती जरूर है,
जो जाम छू लिया किसी बेशहुर ने,
उस जाम से शराब छलकती ज़रूर है,
वो हुस्न क्या जो सैकड़ों पर्दों में छुपा हो,
बिजली है जिसका नाम वो चमकती ज़रूर है!
रात आती है तेरी याद में कट जाती है,
आँख रह रह कर सितारे सी डबडबाती है,
इतना बदनाम हो गया हूँ कि मेरे यहाँ
अब नींद भी आने से शर्माती है!
आँख रह रह कर सितारे सी डबडबाती है,
इतना बदनाम हो गया हूँ कि मेरे यहाँ
अब नींद भी आने से शर्माती है!
चुरा के दिल मुट्ठी में छुपाये बैठे हैं ,
बहाना यह कि मेहंदी रचाए बैठे हैं!
बहाना यह कि मेहंदी रचाए बैठे हैं!
दुनिया प्यासे को तपन देती है,
खिलते फूलों को दफ़न देती है ,
जीते जी तन को कपड़ा नहीं देती,
मरने के बाद उसे कफ़न देती है!
खिलते फूलों को दफ़न देती है ,
जीते जी तन को कपड़ा नहीं देती,
मरने के बाद उसे कफ़न देती है!
मेहरबां होके बुलालो मुझे,चाहे जिस वक़्त,
मैं गया हुआ वक़्त नहीं हूँ कि फिर आ भी न सकूँ!—ग़ालिब—
मैं गया हुआ वक़्त नहीं हूँ कि फिर आ भी न सकूँ!—ग़ालिब—
एतबारे इश्क की खान खराबी देखिये,
गैर ने की आह वो खफा मुझसे हो गए!
गैर ने की आह वो खफा मुझसे हो गए!
ये न थी हमारी किस्मत के विसाले यार होता,
अगर और जीते रहते ,यही इंतज़ार होता!–ग़ालिब—
अगर और जीते रहते ,यही इंतज़ार होता!–ग़ालिब—
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें