प्यार से अमृत पिया,अब ज़हर पीते हैं,
प्यार में हार गए प्यार ही से जीते हैं,
पर जाने क्या बात है महफ़िल के चर्चों में,
लोग तेरा नाम मेरे नाम के साथ लेते हैं!
अंजामे सफ़र देख कर रो देता हूँ,
टूटे हुए पर देख कर रो देता हूँ,
रोता हूँ की आहों का असर हो लेकिन,
आहों का असर देख कर रो देता हूँ
सबको वीरान राह्गुजारों से
सर झुकाए हुए हुए गुजरता हूँ,
कहकहों में करार खोया था,
आसुओं में तलाश करता हूँ!—-सैफुद्दीन सैफ—-
वक़्त कहता है तकिये पे बना दो तलवार,
नहीं तलवार तो तलवार की तस्वीर सही,
सर को तलवार पे रख देने की आदत तो पड़े,
याद आ जाये वो बात यही तदबीर सही !
ज़ख्मे दिल पर मेरे क्यों मरहम का इसेमाल है,
मुश्क गर महंगा है तो क्या खून का भी काल है!
जितना है नमक सब मेरे ज़ख्मों में खपाओ
पलकों से उठाओ न हाथों से गिराओ!
मैंने मासूम बहारों में तुझे देखा है,
मैंने मौहूम सितारों में तुझे देखा है,
मेरे महबूब तेरी पर्दानाशिनी की कसम,
मैंने अश्कों के कतरों में तुझे देखा है!–अहमद नदीम कासमी–
बचपन में ही किया मुझको गम ने शिकस्त,
तय होगी कैसे मंजिलें या रब शबाब की,
गर्दिश रही नसीब में या रब तमाम उम्र,
सागर बता के क्यूँ मेरी मिटटी खराब की!—सागर निजामी
दिल उन्हें याद करता है,जब वह दूर होते हैं,
जब वो करीब आते हैं आँखें उन्हें तरसती हैं!
झूठी ही तसल्ली हो कुछ दिल तो बहल जाये,
धुंधली ही सही लेकिन एक शमा तो जल जाये,
उस मौज की टक्कर से साहिल भी लरजता है,
कुछ रोज तो तूफां के आगोश में चल जाये!—जूना कानपुरी–

मोहब्बत कर के कभी देखो,क्या अंजाम होता है,
यही होता है कि हँसता हुआ इंसान रोता है!
मोहब्बत के धोखे में कोई न आये,
ये एक दिन हंसाये सौ दिन रुलाये!
न सोचा था दिल लगाने से पहले,
कि टूटता है दिल मुस्कुराने से पहले!
वो आये भी तो बगुले कि तरह,
चिराग बन के जले जिनके इंतज़ार में हम!—बगुले=तेज हवा
दिल चुरा कर हमको न भुलाया करो,
गुनगुना कर न गम को सुलाया करो,
दो दिलों का मिलन है यहाँ का चलन,
खुद न आया करो तो बुलाया करो!
किसी को गीत देता हूँ,किसी को साज़ देता हूँ,
बहुत खुश हो गया जिस पर उसे सब राज़ देता हूँ,
कभी जब पास में कुछ न रह जाता लुटाने को,
तेरी सोई हुयी आवाज को आवाज देता हूँ!
मेरे इश्क कि मजबूरियां मजाज़ अल्ला ,
तुम्हारा राज़ तुम्ही से छुपा रहा हूँ मैं!—मजाज़ लखनवी
किसी के मुंह से निकला ये मेरे दफ़्न के वक़्त,
कि इनपे ख़ाक मत डालो ये तो नहाए हुए हैं!
एक दो बूँद से क्या बात बनेगी साकी ,
सारा मयखाना उलट दे मेरे पैमाने में!
चले आ रहे हैं वो जुल्फें बिखेरे,
उजाले से लिपटे हुए अँधेरे!
जब वो पशेमा नज़र आये हैं,मौत का सामां नज़र आये हैं,
कर न सके जिंदगी भर जो फरेब ,ऐसे भी नादां नज़र आये हैं!
खोल कर स्याह बालों को
रोक दो सुबह के उजालों को!
इन मदभरी आँखों में हया खेल रही है,
दो ज़हर के प्यालों में कज़ा खेल रही है!–कजा=मौत
इन मस्त आँखों  को कवँल कह गया हूँ मैं,
महसूस कर रह हूँ ग़ज़ल कह गया हूँ मैं!
वह शज़र हूँ न गुलो बार न साया मुझमे,
बागबाँ ने लगा रख्खा है मगर काटने को!
ये भीगी रात ये बरसात की हवाएं ,
जितना भुला रहा हूँ वो याद आ रहे हैं~
जीवन के स्वर्गीय क्षणों में जब जाओगे मुझको भूल
तब तुम्हे याद दिलाएंगे,मेरी लेखनी के ये फूल!
एक पथ के दो राही अब बदलने जा रहे हैं,
प्यार बन कर मिले थे,याद बन कर जा रहे हैं!
जो अचानक आज इतना याद मुझको आ रहे तुम,
फिर कहीं क्या आंसुओं से दिल को बहला रहे हो तुम!
न दिल लगते न गैर कहलाते,
गुलों में बैठे गुलज़ार की हवा खाते!
ख़त उन्हें लिखते हैं जो मंजिलों पे रहते हैं,
उन्हें क्या लिखें जो सदा दिल में रहते हैं!
कल तक तुम मुझसे करते थे मोहब्बत की बात,
क्या क़यामत है अब करते हो तकरार की बात!
जब उठी कोई चिलमन,मुझे महसूस हुआ,
मेरी आँखों पर बिखरे हैं तेरे गेसू!
उससे भी शोख् तर  हैं उसकी अदाएं,
कर जाएँ काम अपना लेकिन नज़र न आयें!
नींद उसकी दिमाग उसका रातें उसकी,
तेरी जुल्फें जिसके बाजु पर परीशां हो गयीं –ग़ालिब
तो फिर न इंतज़ार में नींद आये उम्र भर,
आने का अहद कर गए आये जो ख्वाब में!–ग़ालिब—
गजब किया तेरे वादे पे ऐतबार किया,
तमाम रात क़यामत का इंतज़ार किया!—दाग
खुद करे मज़ा इंतज़ार का न मिटे,
मेरे सवाल का वो जवाब दें बरसों में!–दाग—
वादे के दिन गुजर गए फिर भी मुन्तजिर,
कुछ हमको इंतज़ार का आजार हो गया है!–असर लखनवी–
तमाम उम्र यूँ ही हो गयी बसर अपनी,
शबे फ़िराक गयी ,रोज-ए-इंतजार आया—नासिख
मौत का इंतज़ार बाकी है,
आपका इंतजार था ,न रहा!—फानी बदायूँनी —
मरने पर भी बंद न हुई चश्मे मुन्तजिर,
अब इंतज़ार की कोई मुद्दत नहीं रही!–जलील मानिकपुरी–

है किसका इंतजार के ख्वाबे आदम से भी,
हर बार चौंक पड़ते हैं आवाजे पा के साथ!