तमाम उम्र मैं रही जिनके साथ
वो चेहरे तो जाने पहचाने थे
पर एक दिन अचानक अनजाने से लगे,
जिनके लिए दिया मैंने अपना वक़्त ,अपनी मेहनत
उन्होंने निकाल फेंका अपनी ज़िन्दगी से यूँ
ज्यों निकाल फेंकता है कोई काँटा अपने पैर से
और पलट कर देखता भी नहीं उसे
तमाम उम्र मैं रही सफर में, बिना मंज़िल तय किये ,
सामने दिखते साहिल को छोड़ कर,
मोड़ देती रही अपना सफीना ,
इन्ही जाने पहचाने लोगों की ओर ,
जो खुद तो खड़े थे साहिल पे ,
लेकिन तमाम उम्र कोशिशें करते रहे लगातार,
डूब जाऊं मैं मंझधार !
साहिल : किनारा ,सफीना : नाव
वो चेहरे तो जाने पहचाने थे
पर एक दिन अचानक अनजाने से लगे,
जिनके लिए दिया मैंने अपना वक़्त ,अपनी मेहनत
उन्होंने निकाल फेंका अपनी ज़िन्दगी से यूँ
ज्यों निकाल फेंकता है कोई काँटा अपने पैर से
और पलट कर देखता भी नहीं उसे
तमाम उम्र मैं रही सफर में, बिना मंज़िल तय किये ,
सामने दिखते साहिल को छोड़ कर,
मोड़ देती रही अपना सफीना ,
इन्ही जाने पहचाने लोगों की ओर ,
जो खुद तो खड़े थे साहिल पे ,
लेकिन तमाम उम्र कोशिशें करते रहे लगातार,
डूब जाऊं मैं मंझधार !
साहिल : किनारा ,सफीना : नाव
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