एक ख्वाहिश पैदा करती है दूसरी ख्वाहिश
दूसरी ख्वाहिश से उगती है तीसरी ,
और ये सिलसिले रहते हैं जारी ता उम्र
दर असल तो होती है
ख्वाहिशें इंसान की
लेकिन ख्वाहिशों का एक दिन,
बन जाता है हुजूम,
जिसमे इंसान हो जाता है गुम ,
यही है इंसान की ज़िन्दगी का पूरा फ़ल्सफ़ा
यही है मज़मून !!
ख्वाहिश : लालसा,फ़ल्सफ़ा : दर्शन ,मज़मून : लिखित व्याख्या
दूसरी ख्वाहिश से उगती है तीसरी ,
और ये सिलसिले रहते हैं जारी ता उम्र
दर असल तो होती है
ख्वाहिशें इंसान की
लेकिन ख्वाहिशों का एक दिन,
बन जाता है हुजूम,
जिसमे इंसान हो जाता है गुम ,
यही है इंसान की ज़िन्दगी का पूरा फ़ल्सफ़ा
यही है मज़मून !!
ख्वाहिश : लालसा,फ़ल्सफ़ा : दर्शन ,मज़मून : लिखित व्याख्या
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें