रह रह कर चुभता है एक अनसुलझा सा सवाल ,
करती हूँ सुलझाने की कोशिश ढूंढती रहती हूँ जवाब
ए मेरी हक़ीक़त ए ज़िन्दगी
क्या बेवफा थी मैं ,या वफादार न रह पाई थी तू
खतावार थी मैं ,या ज़िम्मेदार सरासर थी तू,
जिस मोड़ से राहें हुईं थी जुदा ,उस मोड़ तक ,
मैं तुझे लाई ,या लाई थी तू ,
खुदा की मर्ज़ी थी वो या इसकी गुनाहगार थी तू
जो सितम तूने मुझ पर ढाया
क्या उससे बच पाई थी तू
कसक उम्र भर की जो मुझे दी तूने
क्या वह दर्द कभी,महसूस कर पाई है तू ,
कितनी आसानी से तूने ,मुझे दे दिया धोखा ,
क्या किसी धोखेबाज की, चपेटमें आई है तू ,
खिलौने की तरह खेलती रही मुझसे
और ठुकरा दिया मुझे ,
क्या कभी किसी से ,ठुकराई गई है तू ,
ख़ुशी ख़ुशी तूने ,आबाद कर दी दुनिया सबकी ,
क्या भूले से भी कभी ,मुझे याद कर पाई है तू
रह रह कर दिल में उठता है दर्द
उठती है रह रह कर कलेजे में कसक ,
अपना सबकुछ ,समझी थी तुझे मैं
थोड़ी सी भी मेरी क्यों न बन पाई थी तू
तूने ज़ख्मों से भर दया दामन
क्या दामन को अपने ,बेदाग़ रख पाई है तू
पलट पलट कर मैं देखती रही तुझे
क्या मेरी यादों की जानिब
थोड़ी सी भी मुड़ पाई है तू
नसीब साथ रहा ,मेरे,
मुझे नवाज़ा खुदा ने खुशियों से बेपनाह
क्या उसके करम उसकी रहमत का ,
ऐसा ही साया ,मुझे दे पाई थी तू
तुझसी सौदाई को क्या फायदा हुआ ?
या जबरदस्त खुद से घाटा खा गई है तू
फिर भी तुझको देती हूँ दुआ तू खुश रहे आबाद रहे ,
क्या मेरे लिए कभी खुदा से ,दुआ मांगती है तू !!
बेवफ़ा : कृतघ्न,खतावार:दोषी,सरासर:निश्चित रूप से ,दागदार::कलंकित,दामन:आँचल ,जानिब:तरफ,नवाज़ा:अनुकम्पा की ,सौदाई :व्यापारी,बेपनाह:असीम
करती हूँ सुलझाने की कोशिश ढूंढती रहती हूँ जवाब
ए मेरी हक़ीक़त ए ज़िन्दगी
क्या बेवफा थी मैं ,या वफादार न रह पाई थी तू
खतावार थी मैं ,या ज़िम्मेदार सरासर थी तू,
जिस मोड़ से राहें हुईं थी जुदा ,उस मोड़ तक ,
मैं तुझे लाई ,या लाई थी तू ,
खुदा की मर्ज़ी थी वो या इसकी गुनाहगार थी तू
जो सितम तूने मुझ पर ढाया
क्या उससे बच पाई थी तू
कसक उम्र भर की जो मुझे दी तूने
क्या वह दर्द कभी,महसूस कर पाई है तू ,
कितनी आसानी से तूने ,मुझे दे दिया धोखा ,
क्या किसी धोखेबाज की, चपेटमें आई है तू ,
खिलौने की तरह खेलती रही मुझसे
और ठुकरा दिया मुझे ,
क्या कभी किसी से ,ठुकराई गई है तू ,
ख़ुशी ख़ुशी तूने ,आबाद कर दी दुनिया सबकी ,
क्या भूले से भी कभी ,मुझे याद कर पाई है तू
रह रह कर दिल में उठता है दर्द
उठती है रह रह कर कलेजे में कसक ,
अपना सबकुछ ,समझी थी तुझे मैं
थोड़ी सी भी मेरी क्यों न बन पाई थी तू
तूने ज़ख्मों से भर दया दामन
क्या दामन को अपने ,बेदाग़ रख पाई है तू
पलट पलट कर मैं देखती रही तुझे
क्या मेरी यादों की जानिब
थोड़ी सी भी मुड़ पाई है तू
नसीब साथ रहा ,मेरे,
मुझे नवाज़ा खुदा ने खुशियों से बेपनाह
क्या उसके करम उसकी रहमत का ,
ऐसा ही साया ,मुझे दे पाई थी तू
तुझसी सौदाई को क्या फायदा हुआ ?
या जबरदस्त खुद से घाटा खा गई है तू
फिर भी तुझको देती हूँ दुआ तू खुश रहे आबाद रहे ,
क्या मेरे लिए कभी खुदा से ,दुआ मांगती है तू !!
बेवफ़ा : कृतघ्न,खतावार:दोषी,सरासर:निश्चित रूप से ,दागदार::कलंकित,दामन:आँचल ,जानिब:तरफ,नवाज़ा:अनुकम्पा की ,सौदाई :व्यापारी,बेपनाह:असीम
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